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भोपाल. प्रायोगिक विषय बारहवीं का रिजल्ट बिगाड़ सकते हैं। दरअसल सरकारी स्कूलों में अब तक इन विषयों की पढ़ाई शुरू नहीं हुई है। ऐसा प्रायोगिक विषय की किताबें स्कूलों में देरी से पहुंचने के कारण हो रहा है, जबकि माध्यमिक शिक्षा मंडल ने दसवीं और बारहवीं का सिलेबस इसी साल बदला है।
सरकारी स्कूलों में एक दिसंबर से अर्धवार्षिक परीक्षा शुरू हो रही हैं। शहरी क्षेत्र के स्कूलों में रसायन, जीव विज्ञान और भौतिक विषय की प्रायोगिक पुस्तकें अब पहुंचाई जा रही हैं। वहीं जिले के ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति और भी खराब है। बैरसिया तहसील के सरकारी स्कूलों में ये पुस्तकें अभी देखने को नहीं मिली हैं। जबकि नवंबर माह तक प्रेक्टिकल शुरू हो जाने चाहिए थे।
सिलेबस में गलतियां भी
रसायन के सिलेबस में कोई खास बदलाव तो नहीं आया है, लेकिन टाइट्रेशन (अनुमापन) को डबल के स्थान पर सिंगल कर दिया है। इसलिए शिक्षक असमंजस में हैं कि वे क्या पढ़ाएं। शिक्षक पिछले सालों में डबल टाइट्रेशन पढ़ाते आए हैं। इसके अलावा प्रायोगिक पुस्तक ेमें किसी भी यूनिट के लिए अंक निर्धारित नहीं किए गए हैं। प्रायोगिक जीव विज्ञान के सिलेबस में खासा बदलाव आया है। विषय के शिक्षकों के मुताबिक पिछले साल तक 20 यूनिट में प्रेक्टिकल कराने होते थे, जो सिलेबस बदलने के बाद पांच रह गए हैं। उनके मुताबिक माशिमं ने नया सिलेबस सरल कर दिया है। अब सिर्फ पांच यूनिट से प्रेक्टिकल कराए जाने हैं। प्रेक्टिकल न होने से छात्रों में भी घबराहट है। उन्हें नए सिलेबस को समझने में भी दिक्कत हो रही है।
पुस्तकों के अभाव में शहर के चुनिंदा सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी गाइडों का सहारा ले रहे हैं। नया सिलेबस होने के कारण जुलाई में माध्यमिक शिक्षा मंडल ने शिक्षकों को प्रायोगिक विषयों का प्रशिक्षण कराया था। दो दिवसीय प्रशिक्षण के बाद सिलेबस न मिलने के कारण शिक्षक पूरी तरह से बाजार में उपलब्ध विषय की गाइडों पर निर्भर हो गए। प्रायोगिक विषय के नए सिलेबस के मुताबिक स्कूलों में प्रायोगिक उपकरण भी नहीं हैं। शहर के चुनिंदा स्कूलों को छोड़ दिया जाए, तो शेष में अब उपकरणों की लिस्ट बनाई जा रही है।
किसकी गलती?
माध्यमिक शिक्षा मंडल सचिव कवीन्द्र कियावत का कहना है कि हम सिलेबस तैयार कर छापने को पहले ही दे चुके हैं। स्कूलों में पुस्तकें पहुंचाने का जिम्मा हमारा नहीं है। पुस्तकें स्कूलों में अब तक क्यों नहीं पहुंचीं, कहना मुश्किल है। वहीं पुस्तकों की छपाई और उन्हें स्कूलों तक भेजने का कार्य संभालने वाले मप्र पाठ्य पुस्तक निगम और लोक शिक्षण संचालनालय के अधिकारी भी इस संबंध में कुछ बताने को तैयार नहीं हैं। पाठ्य पुस्तक निगम के एमडी जीके श्रीवास्तव से मोबाइल पर तीन बार संपर्क करना चाहा, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।