Breaking News 
bhaskar Web English


HomeVichaar Vichaar

कैसे बुझेगी यह समंदर की आग?

udai मिसाइलों को हवा में ही ध्वस्त करने वाले भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस तबर को उस समय दुनिया भर में भारी प्रशंसा और वाहवाही मिली, जब उसने 18 नवंबर को उत्तरी सोमालिया की एडेन खाड़ी में सोमालिया के समुद्री दस्यु जहाजों के हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया।

संयोग से इसके पहले 11 नवंबर को भी अपहरण के दो और प्रयासों को तबर ने नेस्तनाबूद कर दिया था। इस तरह इलाके में भारतीय नौसेना की सेवा ‘सिंड्रेला सर्विस’ की साख दोबारा मजबूत हुई। दोबारा इसलिए क्योंकि वर्ष 2003 में मोजाम्बिक में हुए अफ्रीकन यूनियन के शिखर सम्मेलन में भी भारतीय नौसेना ने अबाध सुरक्षा मुहैया करवाई थी।

जिस समय आईएनएस तबर पर प्रशंसा की बौछारें की की जा रही थीं, जिसका वह वाकई में हकदार भी है, उस समय दस्युओं के एक जहाज के डूबने का भी उस वृहद समस्या पर बहुत मामूली असर पड़ा, जो इस समय अफ्रीका के पूर्वी तट पर एक बड़ी समस्या बन गई है। इसे इसके सही-सही साम्राज्यवादी संदर्भो में समझा जाना चाहिए।

इंटरनेशनल मैरीटाइम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2008 के शुरुआती नौ महीनों में दुनिया भर में समुद्री अपहरण की 199 घटनाएं हो चुकी हैं। इनमें से 63 घटनाएं तो अकेले एडेन की खाड़ी और सोमालिया के पूर्वी तट पर हुई हैं। पिछले दो महीनों में तो ये आंकड़े अपने चरम पर पहुंच गए हैं। पिछले हफ्ते के आंकड़े तो यहां तक कहते हैं कि प्रतिदिन दो व्यापारिक जहाजों पर हमले हो रहे हैं।

इन स्थितियों से कुछ सवाल तो साफ हैं कि आखिर क्यों दुनिया को इस समस्या का सामना करना पड़ रहा है? यह बात थोड़ी चौंकाने वाली है कि 21वीं सदी में भी इस तरह की घटनाएं हो रही हैं, लेकिन यह समुद्र की दुनिया का कटु सत्य तो है ही। जिस तरह सोमालिया में समुद्री अपहरण की घटनाएं बढ़ी हैं, वह सवाल अब तक अनछुआ ही रहा है। अनुमान है कि लगभग 20,000 व्यापारिक जहाज प्रतिदिन एडेन की खाड़ी से गुजरते हैं। इस रास्ते में आए दिन होने वाले समुद्री अपहरण ने व्यापारियों को मजबूर किया है कि वे आने-जाने के लिए ज्यादा लंबे रास्ते का उपयोग करे, जिससे उनके आर्थिक संसाधनों पर विपरीत असर पड़ेगा।

समुद्री जहाजों के अपहरण की बढ़ती घटनाओं का सामना करने के लिए अंतरराष्ट्रीय नीति की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। यदि यह नीति संयुक्त राष्ट्र संघ की अगुवाई में बने तो और भी बेहतर रहेगा। लेकिन इसके लिए सबसे पहले तो विभिन्न देशों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक सर्वानुमति की जरूरत होगी। ऐसे प्रयास सफल हो सकते हैं, यह मलक्का जल डमरूमध्य के मामले में साबित हो चुका है। यहां इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच पारस्परिक सहयोग से जहाजों पर डकैती व अपहरण की घटनाओं पर काफी कुछ अंकुश लगा है, हालांकि अब भी इसका पूरी तरह उन्मूलन नहीं हो पाया है।

सोमालिया के मामले में थोड़ा पेंच है। यह देश असफल देशों की श्रेणी में गिना जाता है। सोमालिया में जब तक गरीबी बरकरार है और कानून एवं व्यवस्था की स्थिति बदतर बनी रहेगी, तब तक नए जलदस्यु पैदा होते रहेंगे। यह कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति है, जैसी अफगानिस्तान में आतंकियों को लेकर है।

मेरा मानना है कि समन्वय के साथ किए गए दृढ़ प्रयास ही समस्या का रणनीतिक समाधान होगा। इसलिए जरूरत पूर्वी अफ्रीकी और खाड़ी के देशों के साथ वैश्विक स्तर पर तालमेल करने की है। इस दिशा में भारत एक सकारात्मक भूमिका निभा सकता है, लेकिन मसले की संवेदनशीलता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ का बैनर जरूरी होगा। संघ के सदस्य ऐसे अंतरराष्ट्रीय अभियानों को सैन्य ताकत प्रदान कर सकते हैं, लेकिन अब तक अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों ने कोई विशेष रुचि नहीं दर्शाई है।

भारत ने हिंद महासागर में कुछ पहल की है और उसे सफलता भी मिली है। जहाजों के अपहरण की चुनौती को रोकने के लिए ऐसे प्रयासों को बढ़ावा दिया जा सकता है। वर्तमान मंे हो रहीं घटनाओं को नियंत्रित करने के लिए फिलहाल तो तुरंत प्रभावित क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक पहल की जरूरत है, लेकिन विभिन्न देशों के बीच तालमेल कैसे बनाया जाए, इस मुद्दे का समाधान सावधानी के साथ करना होगा।
- लेखक रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड:
 

आपके विचार
sudhir kamble
Sunday, 23rd Nov 2008, 16:05
article is to good