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मैं दुनिया की किसी भी चीज के बारे में सोचूं, फिल्म, संगीत या कुछ भी, हमेशा नृत्य की भाषा में ही सोचती हूं। बचपन से नृत्य ही मेरा एकमात्र शौक, पैशन, सपना, सबकुछ रहा है, लेकिन तब मैं जरूर यह नहीं जानती थी कि एक दिन हिंदी सिनेमा ही मेरी कर्मभूमि बन जाएगा।
हिंदी फिल्मों का कोई जिक्र डांस के बगैर पूरा नहीं होता। दुनिया की किसी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी फिल्में नहीं बनतीं, जैसी हमारे यहां बनती हैं। हिंदी फिल्में दुनिया भर में अपने गानों और नृत्य के कारण ही जानी जाती हैं। यह हमारी अनूठी पहचान है, जिसे किसी की नकल के पीछे हमें नहीं बदलना चाहिए। दरअसल, हम भारतीय काफी मनोरंजनप्रिय और उत्सवधर्मी लोग हैं। हमारे यहां शादी-ब्याह, जन्म आदि कोई भी शुभ अवसर नृत्य और संगीत के बगैर पूरा नहीं होता है। समय काफी बदल गया है। हिंदी फिल्में नृत्य के हर युग की गवाह रही हैं। उन्होंने बड़े उतार-चढ़ाव और बदलाव देखे हैं। मेरे नाना हीरालाल जी खुद बड़े कोरियोग्राफर थे। बचपन में मैं छिप-छिपकर उनके डांस देखा करती थी, क्योंकि मैं लड़की थी और लड़कियों को ये सब करने की इजाजत नहीं थी।
पद्मिनी से लेकर मिथुन चक्रवर्ती और माधुरी दीक्षित तक सब अपने आप में डांस की एक पूरी पीढ़ी रहे हैं। मैं मिथुन दा की बहुत बड़ी फैन हूं। माधुरी पर फिल्माया गया गीत एक-दो-तीन कई मायनों में हिंदी फिल्मों का सदाबहार गीत है। हिंदी फिल्मों में नृत्य तो दशकों से हो रहा है, लेकिन कुछ चीजें ही माइल स्टोन हो पाती हैं। बहुत कम लोग ही इस कला को अपनी आत्मा से साध पाते हैं। दरअसल, किसी भी कला को कुछ थोड़े कला पारखी लोगों के दायरे से बाहर निकालकर बड़े संसार में लोगों तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती का काम है। शास्त्रीय नृत्य और संगीत के विपरीत हिंदी फिल्में यह काम बखूबी करती हैं।
मैंने कथक, भरतनाटच्यम, जैज और लैटिन अमेरिकन डांस सीखा है। आज भी कई बार यह सवाल उठता है कि अपनी कला के लिए ऑडीटोरियम का मंच नहीं, बल्कि सिनेमा का बड़ा पर्दा क्यूं? आखिर यही माध्यम क्यूं? मैंने बहुत सोच-समझकर यह निर्णय लिया और फिल्मों में अपनी कला को आजमाना ज्यादा बेहतर समझा। क्लासिकल डांस तो थोड़े ही लोग देखते हैं, जिनमें कला की समझ होती है, लेकिन फिल्मों के माध्यम से आपका काम करोड़ों दर्शकों तक पहुंच रहा होता है। मुझे लगता है कि करोड़ों लोगों के सामने आपकी परीक्षा ज्यादा कड़ी होती है और वहां सफल होने के लिए ज्यादा परिश्रम और प्रतिभा की दरकार होती है।
किसी भी कला की सफलता का आधार उसकी उन्मुक्तता और र्निबधता होती है। वह कितनी आजाद है और दुनिया की अन्य कलाओं को कितना अपने भीतर समाहित कर सकती है। उसे किन्हीं नियमों और खांचों में बांधकर नहीं रखना चाहिए। उसे उड़ने के लिए जितना बड़ा और खुला आकाश मिले, उतना अच्छा है। सिर्फ नृत्य ही नहीं, यह बात तो हर कहीं लागू होती है। आजादी ही उन्नति की ओर ले जाती है। मैंने नृत्य को लेकर जो प्रयोग किए, उसमें किसी एक विधा में न बंधकर सबको अपनाना और आपस में जोड़ना रहा है। मेरे डांस कंपोजिशन में भारतीय और पाश्चात्य, सभी नृत्यों की झलक मिल जाएगी। मेरी तो यहां तक कोशिश होती है कि अगर मैं ब्राजील में शूटिंग कर रही हूं तो वहां के पारंपरिक नृत्य और संगीत को भी जानने की कोशिश करूं ताकि हमारे नृत्य में एक स्थानीय स्वाद भी आ सके।
आज लीक से हटकर फिल्में बन रही हैं, जिसमें ब्लैक जैसे प्रयोग भी हैं। ऊपरी तौर पर यह लगता है कि वह एक नृत्य-संगीत विहीन फिल्म है, लेकिन उस फिल्म का अपना एक संगीत है। नृत्य के साथ भी ऐसे अभिनय प्रयोग हो सकते हैं, जो गाजे-बाजे और शोर-शराबे के दायरे से बिल्कुल मुक्त हों। जिनमें इतना नयापन और गहराई हो कि वह असंख्य लोगों को छू सके। यह संभव है, अगर आपके मन में कला के प्रति एक साधना का भाव हो और आपकी नीयत अच्छी हो। प्रतिभा तो होती ही है, लेकिन अगर नीयत और ईमानदारी नहीं है तो प्रतिभा भी बेमानी हो जाती है।
- लेखिका हिंदी फिल्मों की जानी-मानी कोरियोग्राफर हैं।
यह आलेख मनीषा पांडेय से बातचीत पर आधारित है।