Breaking News 
bhaskar Web English


HomeVichaar Vichaar

देश को चाहिए मनमोहनी नेता

दो टूक. suhel हम भारतीय पैदाइशी ही निंदक होते हैं। इसलिए दूसरों की सराहना शायद ही कभी करते हैं। मैं काफी पहले से ही डा. मनमोहन सिंह का प्रशंसक रहा हूं। न केवल उनकी राजनीतिक प्रखरता की वजह से (मेरे इस बयान पर चौंकिए मत, वे वास्तव में राजनीतिक रूप से बेहद प्रखर व चतुर हैं), बल्कि उनके उस व्यवहार की वजह से भी जो वे समय-समय पर प्रदर्शित करते आए हैं। उनका यह व्यवहार एक विद्यार्थी और शिक्षक के रूप में आत्मसात किए गए मूल्यों के कारण प्रतिबिंबित होता है।

पिछले कुछ सालों से मनमोहन सिंह हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में नियमित रूप से अतिथि के तौर पर भाग लेते रहे हैं। समिट की शुरुआत उन्हीं के भाषण से होती है, इसलिए उनका भाषण न केवल समिट का रुख, बल्कि संदर्भ भी तय कर देता है। इससे पहले मैं उन्हें सुनने के लिए उतना उतावला कभी नहीं था, जितना इस साल रहा। इसकी वजह भी थी। इस वर्ष उन्हें उस विषय पर बोलना था जिसके वे विशेषज्ञ रहे हैं। विषय था: भारतीय अर्थव्यवस्था और दुनिया में भारत का स्थान। यही वजह थी कि इस साल के समिट में उनके मुंह से ऐसी ठोस बातें निकलीं जिसकी उम्मीद इन दिनों हमारे कर्णधारों या राजनेताओं से नहीं की जाती।

उन्होंने साफ कहा कि यह मानने की कोई वजह नहीं है कि इस दुनिया में भारत एक सुरक्षित द्वीप की भांति है और आर्थिक झंझावातों का उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह वित्त मंत्री के उस बयान के बिल्कुल विपरीत राय थी जो उन्होंने वैश्विक आर्थिक संकट की शुरुआत में दिया था। प्रधानमंत्री की यह स्वीकारोक्ति अहम थी कि आर्थिक संकट से भारत भी नहीं बचेगा। मनमोहन सिंह द्वारा अपने भाषण में जताई गई यह ईमानदारी दरअसल इस व्यक्ति की सद्-इच्छाओं में शामिल रही है और इसीलिए मेरा मानना है कि उनके जैसे शख्स का प्रधानमंत्री बनना वास्तव में भारत के लिए एक वरदान के समान है।

मनमोहन सिंह कितने दृूरदर्शी और प्रेरक हैं, इस बात का अंदाजा आर्थिक मोर्चे पर साहस दिखाने और विकास में शिक्षा व ज्ञान की भूमिका को स्वीकारने से लगाया जा सकता है। वे कहते हैं कि यदि भारत को बदलना है तो देश के करोड़ों लोगों तक ज्ञान की रोशनी पहुंचानी होगी। वे स्वयं के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का श्रेय भी ज्ञान को ही देते हैं जिसे लेकर पूर्ववर्ती पंजाब रियासत में स्थित उनके छोटे-से गांव ने उत्साह जताया था। भारत को इसी उदारता की जरूरत है, न कि उस विभाजनकारी मानसिकता की जो भारतीय राजनीति में अक्सर देखने को मिलती है।

यदि वास्तव में बदलाव लाना है तो देश को मनमोहन ¨सह जैसे और भी कई व्यक्तित्व संपन्न लोगों की जरूरत होगी। उनमें राजनीतिक चातुर्यता के अभाव को लेकर काफी शोर मचाया जा चुका है। यह कुतर्क वैसे भी दम तोड़ चुका है क्योंकि पहली बार सीनेटर बना व्यक्ति अब अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति के रूप में गद्दी संभालने जा रहा है। मनमोहन सिंह ने अपने शासनकाल में सर्वानुमति और पक्षपात रहित वातावरण बनाने में अहम भूमिका निभाई है।

मुझे लगता है कि ये ही बातें देश में एकता बनाए रख सकती हैं। समिट में प्रधानमंत्री के भाषण का मुख्य सारतत्व भी यही था। उन्होंने कहा कि यदि भारत को आर्थिक भंवर और राजनीतिक तूफानों से उभरना है तो देश की एकता को शीर्ष पर रखना होगा। इसलिए मुझे उम्मीद है मनमोहन सिंह अपने पीछे केवल ‘मनमोहनी अर्थशास्त्र’ ही छोड़कर नहीं जाएंगे, बल्कि वे एक ऐसी राजनीतिक विरासत भी हमें सौंपकर जाएंगे जो हमारे लिए प्रेरणादायी और प्रभावी दोनों रहेगी।

उधर, दूसरी ओर साध्वी और मालेगांव मसले पर लालकृष्ण आडवाणी और अन्य नेताओं द्वारा हाय-तौबा मचाने से मैं व्यक्तिगत तौर पर बेहद निराश हूं। भारतीयों को अब तो आतंकवाद और कानून एवं व्यवस्था का राजनीतिकरण करने से ऊपर उठना चाहिए। वहीं अमर सिंह ने बटाला हाउस मुद्दे पर जो कुछ किया, वह भी बेहद निंदनीय है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि हत्यारा कौन हैं, हिंदू है या मुस्लिम। मासूम नागरिकों को मारने वाला कोई भी हो, उसे फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए। मैं चाहता हूं कि आडवाणी साध्वी के मसले पर भी वैसा ही रवैया अपनाएं, जैसा उन्होंने अफजल गुरु प्रकरण में दिखाया था।

वर्षो से गैर राजनीतिज्ञ कई महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाते आए हैं। राजनीति को एका बनाने का काम करना चाहिए, बांटने का नहीं। इस मोर्चे पर दृढ़ता दिखानी चाहिए, वैसे ही दृढ़ता जैसी एटमी करार पर दिखाई गई थी। यहीं पर सहज शालीनता का भी प्रदर्शन होना चाहिए। मेरा मानना है कि मनमोहन सिंह दूसरे कार्यकाल के लिए पहले से अधिक तैयार होंगे।
- लेखक काउंसलएज के मैनेजिंग पार्टनर हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: