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क्या मार्गरेट अल्वा के दिमाग में कुछ और पक रहा है? मार्गरेट को कभी सोनिया गांधी के इतना नजदीक समझा जाता था कि पार्टी सहयोगी उनका रास्ता काटने से पहले कांप जाते थे। ऐसे में उन्होंने अपनी पार्टी पर भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद का आरोप लगाने के लिए यही समय क्यों चुना?
अल्वा कोई नौसिखिया नहीं हैं। उन्हें विद्रोह की कीमत पता है। उनके विद्रोही रुख की वजह वाजिब थी। उनके पुत्र को कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में टिकट नहीं दिया गया। वजह बताई गई कि कांग्रेस में वंशवाद को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा। यह एक ऐसी पार्टी के लिए अजीब तर्क है, जिसने अपना सबसे शक्तिशाली पद एक वंश के लिए आरक्षित कर रखा है। अल्वा को पता था कि पार्टी में व्याप्त दोहरे मानदंडों को उजागर कर वे अपनी सीट नहीं बचा सकतीं। चूंकि ऐसे रुख से कोई व्यक्तिगत फायदा संभव नहीं है। तो अल्वा के मन में कौन-सा राजनीतिक उद्देश्य रहा होगा?
मार्गरेट अल्वा ने चाहे हाईकमान की फटकार के बाद पद से इस्तीफा दे दिया हो, लेकिन उन्होंने कोई राजनीतिक संन्यास नहीं ले लिया है। उन्हें लगता है कि उनके कॅरियर में अभी सक्रिय राजनीति के कई साल शेष हैं। पार्टी में और भी भुक्तभोगी हैं, वे अकेली नहीं हैं। आम नीति यही है कि अच्छे दिन आने की उम्मीद में इंतजार किया जाए। फिर उन्होंने अलग विकल्प क्यों चुना? उन्होंने यह भाजपा में शामिल होने के लिए तो नहीं किया। इस विकल्प को वे तरजीह नहीं दे सकतीं। हालांकि भाजपा अपने यहां एक भरोसेमंद ईसाई नेता का स्वागत ही करेगी।
कांग्रेस के द्वितीय पंक्ति के नेतृत्व में कुछ खदबदा रहा है। हर बड़ी पार्टी में शिकवा-शिकायत है। मध्यप्रदेश व राजस्थान के मौजूदा चुनाव से जाहिर है कि भाजपा में भी यह चल रहा है। यदि मध्यप्रदेश में मायावती कांग्रेस के वोट काट रही हैं तो उमा भारती व गोविंदाचार्य भाजपा के खिलाफ यही काम कर रहे हैं। राजस्थान में वसुंधराराजे को असंतोष के लिए पार्टी के बाहर देखने की जरूरत नहीं है। उन्हें कांग्रेस के बजाय इस बात की अधिक चिंता होनी चाहिए कि भितरघात कैसे उनके अवसर खत्म कर सकता है।
असंतुष्ट भितरघात के लिए तो हमेशा तैयार रहते हैं, लेकिन बहुत कम मौकों पर विद्रोह पर उतारू होते हैं। पार्टियां असंतोष की अनदेखी करती हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि किसी भी फैसले का कुछ तो विरोध होगा ही, लेकिन वे विद्रोह बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं होतीं।
क्या कांग्रेस में विद्रोह अवसर की प्रतीक्षा कर रहा है? महाराष्ट्र के नारायण राणो जैसे कुछ नेताओं ने इस बात की परवाह करना छोड़ दिया है कि प्रादेशिक अथवा राष्ट्रीय नेता क्या सोचते हैं। वे अपने ही मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को बेधड़क निशाना बनाते रहते हैं। इधर, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री की उपेक्षा कर राज ठाकरे के संकुचित नजरिए को बढ़ावा देते रहते हैं। दिल्ली मौन रहकर मुद्दा बदल देती है। मौजूदा क्षमता के तहत किसी को काबू में करना इसके बस की बात नहीं है।
राजनीतिक नेतृत्व की ताकत जीत दिलाने की इसकी क्षमता में ही निहित होती है। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस वहां चुनाव हार चुकी है, जहां यह सत्ता में थी और अब लगता नहीं है कि यह भाजपा के खिलाफ सत्ताविरोधी रुख को जीत में बदल सकेगी। इस पृष्ठभूमि में द्वितीय पंक्ति का कांग्रेस नेतृत्व अधीर होकर हलचल करने लगा है। मौजूदा संकेतों के मुताबिक भाजपा छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश में सत्ता में वापस लौट सकती है जबकि राजस्थान व दिल्ली में भी इसका दावा बरकरार है। हालांकि हर समझदार व्यक्ति यह जानता है कि मतगणना तक नतीजे के बारे में पक्का कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
मार्गरेट अल्वा जैसे नेताओं को कांग्रेस व भाजपा के बीच में जगह की तलाश है। उन्हें लगता है कि भाजपा व कांग्रेस मिलकर 270 से ज्यादा सीट नहीं जीत पाएंगे। इसका मतलब है कि शेष सदन का गठबंधन सैद्धांतिक रूप से बहुमत हासिल कर सकता है। इसके लिए एनडीए और यूपीए का टूटना जरूरी है। यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि एनडीए के घटक दल राज्यों में सत्ता के सहभागी हैं। अकालियों और नीतीश कुमार को क्रमश: पंजाब व बिहार में अपनी सत्ता दांव पर लगानी होगी। अगले कुछ बरसों में हमें जो राजनीतिक अस्थिरता देखने को मिलेगी, उसमें उनके सामने राजनीतिक महत्व कम होने का जोखिम पैदा हो जाएगा। फिर क्षेत्रीय दलों में भी गहरी शत्रुता है।
मायावती व मुलायम अथवा लालू व नीतीश एक ही गठबंधन में साथ नहीं रह सकते। हैदराबाद में सत्ता के घनघोर संघर्ष के बाद क्या चंद्रबाबू व चिरंजीवी एक ही सरकार में शामिल होंगे? यदि छह प्रधानमंत्रियों की कोई व्यवस्था होती तो ऐसा संभव था, लेकिन खेद है कि ऐसी राजनीतिक व्यवस्था हमारे यहां नहीं है। ऐसा संभव न लगता हो, लेकिन असंभव भी नहीं है। ऐसे विकल्पों पर विचार होना यही बताता है कि कई वरिष्ठ राजनेताओं को यूपीए के फिर से चुनकर आने का भरोसा नहीं है।
निश्चित ही इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि दिल्ली में अगली सरकार तो नतीजे आने के बाद ही बनेगी। यह इस अर्थ में कि कोई भी चुनाव पूर्व गठबंधन अपने बल पर बहुमत जुटाने में कामयाब नहीं हो पाएगा। इसी तरह तो यूपीए अस्तित्व में आया था। 272 के जादुई अंक के नजदीक जो भी होगा, उसे फायदा मिलेगा, लेकिन यह एकमात्र निर्णायक तत्व नहीं होगा। सरकार चलाने की शर्ते गठबंधन तय करेगा और मुख्य दल को उन्हें स्वीकार करना होगा। खतरा स्पष्ट है : राजनीतिक अस्थिरता को आर्थिक अस्थिरता में मिला दीजिए और जो संकट हमारे सामने पहले से ही मौजूद है, वह बेकाबू हो जाएगा।
- लेखक पाक्षिक पत्रिका ‘कोवर्ट’ के चेयरमैन हैं।