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कब मिलेगा वोटर कार्ड का अधिकार

इंदौर. मतदाता परिचय पत्र। यह वो कार्ड है जिसका उपयोग मतदान में भले ही न हो, लेकिन गाड़ी खरीदने, बैंक अकाउंट खुलवाने और अन्य जरूरतों में जरूर उपयोगी साबित हो रहा है। प्रशासन द्वारा 25 सौ लोगों का स्टाफ, लाखों रुपए और 95 फीसदी काम पूरा करने के बाद भी इसकी अनिवार्यता ऐन चुनाव के पहले समाप्त कर दी गई। सन् 1995 से यह ‘बीरबल की खिचड़ी’ की तरह पक रहा है। 13 साल से यह काम चल रहा है, अभी तक पूरा होने का नाम नहीं ले रहा।

तीसरा चुनाव होने को है, विसंगतियां हैं कि कम नहीं हो पा रही। अभी भी 25 हजार से ज्यादा कार्ड नहीं बंट सके हैं। इंदौर जिले में 14 लाख से ज्यादा वोटर आईडी कार्ड बनाने का दावा निर्वाचन विभाग कर रहा है। 95 फीसदी काम प्रशासन के अनुसार निपट चुका है जबकि चुनाव आयोग ने वोटर कार्ड के काम को संतोषजनक नहीं मानते हुए इसकी अनिवार्यता इस चुनाव में भी समाप्त कर दी। इसके पहले वर्ष 2003 और 1998 के चुनाव में भी कार्ड का महत्व खत्म कर दिया गया था। यह तीसरा चुनाव है जब इतनी मशक्कत करने के बाद भी सौ फीसदी कार्ड न तो बन सके और न बंट पाए।

लिस्ट में भी फोटो नहीं
जिला निर्वाचन कार्यालय ने कार्ड की वैकल्पिक व्यवस्था फोटो वाली वोटर लिस्ट के रूप में की है लेकिन लिस्ट में अधिकांश मतदाताओं के नाम, पते तो हैं, लेकिन फोटो गायब हैं। अब ऐसे मतदाताओं की समस्या ये है कि लिस्ट में फोटो न होने के कारण कहीं मतदान का अधिकार न छिन जाए। लिस्ट में संशोधन भी 25 नवंबर तक होगा।

काम पूरा नहीं हो पाया
जिला निर्वाचन अधिकारी राकेश श्रीवास्तव ने कहा जिले में सौ फीसदी काम नहीं हो पाया। इस वजह से चुनाव आयोग ने कार्ड की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। वोटर लिस्ट वार्डवार बांट दी गई।

13 रुपए का एक कार्ड
निर्वाचन पर्यवेक्षक सुरेश यादव ने बताया कार्ड बनाने की दर समय-समय पर बदलती रही। इस समय ग्वालियर की एक फर्म 13 रुपए के मान से एक कार्ड बन रही है। इसके पहले नौ और आठ रुपए की दर से कार्ड बनाए जा रहे थे। इस दर से कार्ड बनाने वाले ठेकेदार काम छोड़कर भाग गए। इस कारण भी बनाने और बांटने का काम पूरा नहीं हो पाया।

कार्ड में भी कोई न कोई त्रुटि
इस बार बने कार्ड में मतदाता का जन्म वर्ष तो है लेकिन महीना और तारीख नहीं है। किसी का मोहल्ला बदला है तो कहीं पति को पिता बना दिया। सूत्रों के मुताबिक पिछले दिनों एक लाख से ज्यादा कार्ड संशोधन के लिए आए थे। इनमें अधिकतर को कार्ड दोबारा नहीं मिले हैं। सांवेर, देपालपुर, महू तहसील के मतदाता कार्ड गलतियों के मामले में अव्वल हैं।





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