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समर शेष है. नाव में हार-जीत का पहले ही अंदाजा लगाना हो तो गांव के बच्चों के बीच लगातार समय बिताइए। यदि वे किसी पार्टी या प्रत्याशी के नारे को अपनी ही धुन पर आवाज देते शाम को दौड़ते नजर आएं तो उसकी जीत लगभग तय मानिए। क्योंकि गांवों में राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक माता-पिता कभी भी अपने बच्चों को वो नारा ज्यादा समय तक नहीं लगाने देते- जो हारने वाली पार्टी का हो। न ही उस उम्मीदवार का बिल्ला ही उन्हें खेलने को देते हैं।
हमारे चुनाव में इस बार कोई रोचक नारे उभर कर अभी तक सामने नहीं आए हैं- लेकिन जैसे-जैसे वोटिंग का दिन पास आता जाएगा, एक से बढ़कर एक चुटीले स्थानीय नारे बनने लगेंगे। राज्य में भाजपा ने ‘जय-जय राजस्थान’ से शुरुआत की - जो वास्तव में पिछले साल गुजरात में नरेंद्र मोदी आधारित भाजपा के प्रसिद्ध नारे ‘जीतेगा गुजरात’ से प्रभावित है।
मोदी ने इस थीम को आगे बढ़ाकर ‘आपणो गुजरात, आग्वो गुजरात’ बना दिया था। अब जबकि पूरी भाजपा में मोदी के नुस्खे ही प्रचलित हैं- संभवत: इसीलिए राजस्थान भाजपा ने भी पार्टी की जगह राज्य को ही नारा बना दिया है। फिर इसी को बढ़ाकर ‘अब नहीं रुकेगा राजस्थान’ नारा बनाया। इधर, प्रदेश कांग्रेस ने इसके विरुद्ध ‘राज बदल कर दम लेगा, अब नहीं झुकेगा राजस्थान’ चलाया है।
नारों की अपनी ताकत है। नारों से बात इतनी सरलता से रखी जा सकती है, जो हजारों सभाओं-भाषणों- रैलियों के माध्यम से भी संभव नहीं होती। गली-मोहल्लों में जब ‘सबका प्यारा गाय बछड़ा’ गूंजता था तो कांग्रेस का माहौल यूं ही बन जाता था। आपातकाल के बाद ‘हलधर किसान, जनता पार्टी का निशान’ जितना चौपालों पर लोकप्रिय था, उतना ही कॉलेजों में चर्चित। चूंकि पार्टी नई थी इसलिए नारे में चतुराई से गांवों के लिए चुनाव चिन्ह और शहरों के लिए पार्टी का नाम डाला गया।
चुनावी इतिहास में सबसे ज्यादा प्रचलित, विवादित और तर्क-वितर्को का आधार बना नारा 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिया था- इंडिया शाइनिंग। कहने को यह भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का 65 करोड़ रुपए का विज्ञापन अभियान था, किंतु इसे चुनावी नारा बनाने पर भारी आपत्तियां आईं और चुनाव आयोग की रोक भी लगी। आरोप लगा- नारे पर 500 करोड़ रु. खर्च हो चुके हैं- वो भी सरकारी। यानी जनता के। जानना दिलचस्प होगा कि चुनावी नारा बनने के पहले भाजपा सरकार उसे दो माह में 9472 बार टीवी चैनलों पर दिखा चुकी थी- यानी सिर्फ पोलियो संबंधी अभियान से कम।
जिन राज्यों में हमारे साथ चुनाव हो रहे हैं- वहां इन्हीं दलों के नारे अलग-अलग हैं। दिल्ली में भाजपा ‘महंगी पड़ी कांग्रेस’ कहकर 10 साल बाद सत्ता पाने की कड़ी लड़ाई लड़ रही है। बढ़ती कीमतों को लेकर ही उसने छत्तीसगढ़ में ‘3 रु. चावल, फोकट में नून, भाजपा सरकार को फिर से चुन’ ही चलाया। इन सभी राज्यों में कांग्रेस के नारे ‘भ्रष्टाचारियों का राज बदल दो’ जैसे पुराने अंदाज वाले ही हैं।
स्थानीय भाषा को नारे में महत्व देने की हर चुनाव में परम्परा है, किंतु किसी लोकप्रिय जुमले को चुनाव से जोड़ने का भारी नुकसान हो सकता है- गुजरात के चुनाव में सिद्ध हुआ। कांग्रेस ने ‘चक दे गुजरात’ का नारा हिट फिल्म से बनाया। मोदी ने हर सभा में ‘चक दे’ का अर्थ लोगों से पूछा- कोई न बता पाया। मखौल उड़ाने में माहिर मोदी फिर व्याख्या करते : पंजाब में गड्ढे में फंसे ट्रक-ट्रैक्टर का पहिया निकालने के लिए जो मेहनत लगती है, उस दौरान हौसला बढ़ाने के लिए ‘जोर लगाके.. हइसा’ जैसा ‘चक दे’ कहा जाता है। कांग्रेस गड्ढे में फंसी है, इसलिए ऐसे ‘बाहरी नारे’ लगा रही है।
कुछ नारे इतने प्रभावी रहे हैं जो कालजयी बन गए। ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देते समय इंदिरा गांधी ने शायद ही सोचा हो कि इसका उपयोग हमेशा होता रहेगा। इस बार के चुनावों में लग रहा है कि नारे बन ही नहीं पा रहे। क्यों? राजनीतिक दलों का उत्तर भी आश्चर्यजनक हैं- भास्कर द्वारा पूछे जाने पर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर ने कहा कि नारों से चुनाव नहीं जीते जाते, इसलिए हम काम पर ध्यान दे रहे हैं।
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी के अनुसार नारे तो लोकसभा चुनावों में आते हैं, विधानसभा में जरूरत ही नहीं। दोनों नेता कहते हैं- ‘फिर भी जोश भरने के लिए कुछ नारे’ बनाए गए हैं। यानी कम से कम एक मुद्दा तो ऐसा मिला जिस पर भाजपा-कांग्रेस एक ही जैसा बोलते हैं। भले ही वो ‘क्रिएटिविटी’ की दोनों दलों में एक सी कमी का प्रतीक क्यों न हो!