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नई दिल्ली. वैश्विक वित्तीय संकट के चलते सरकार घरेलू अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाये रखने के लिए लगातार कदम उठा रही है। आने वाले दिनों में भी कई वित्तीय और राजकोषीय कदमों की घोषणाएं हो सकती हैं। लेकिन जनवरी आते-आते आर्थिक मसलों पर क्रियान्वयन में ढील आ सकती है और यह दौर आगामी लोक सभा चुनाव के बाद गठित होने वाली सरकार के कामकाज संभालने तक जारी रह सकता है।
चुनावी माहौल और आचार संहिता की बंदिशों के चलते आर्थिक मोर्चे पर बरती जाने वाली ढील देश के आम नागरिक और अर्थव्यवस्था के लिए घातक हो सकती है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह असाधारण समय है और असाधारण समय में ही नेतृत्व की परीक्षा होती है। लेकिन वह नेतृत्व फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।
न तो सरकार की ओर से और न ही विपक्ष इस घड़ी को समझकर आगे आ रहा है। राजनीतिक दल अब भी बयानबाजी से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। जनवरी के बाद चुनावी माहौल बनना तय है। उस स्थिति में संवेदनशील आर्थिक फैसलों और उनके क्रियान्वयन पर राजनीतिक सहमति को लेकर परस्पर विरोधी राय सामने आ रही है। कुछ राजनीतिक दलों और अर्थविदों का कहना है कि मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में राजनीतिक परिपक्तवता का परिचय देते हुए राजनीतिक दलों को साझा फैसला प्रक्रिया अपनाने की दिशा में पहल करनी चाहिए। इसके लिए एक सर्वदलीय समिति भी बनाई जा सकती है जो जरूरी फैसले ले सके। लेकिन सत्तारुढ़ कांग्रेस सहित कुछ दल इसकी जरूरत नहीं समझ रहे हैं।
पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा सांसद यशवंत सिन्हा कहते हैं कि देश के सामने खड़े मौजूदा आर्थिक संकट से जूझने के लिए एक कॉमन प्लेटफार्म बनाया जाना चाहिए। यह पहल सरकार को करनी चाहिए, पर वही इससे पूरी तरह उदासीन दिखाई दे रही है। इस मसले पर एक राष्ट्रीय और सर्वदलीय सहमति बनाई जानी चाहिए। हमने अपनी तरफ से पहल भी की लेकिन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने उसे कोई अहमियत नहीं दी। उल्टे यह जवाब दिया कि सरकार को इस संकट के बार में सबकुछ पता है।
हमलोग अपनी तरफ से प्रयास कर रहे हैं। लालकृष्ण आडवाणी ने पिछले दिनों उद्योगपतियों से मिलकर संकट की समीक्षा की। वित्त मंत्री पी चिदंबरम अपने को भारत ही नहीं, दुनिया भर में सबसे ज्यादा अक्लमंद समझते हैं जिन्हें किसी के सलाह की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन सिन्हा यह स्पष्ट नहीं करते कि आडवाणीजी भी यह पहल कर सकते हैं। उनको उद्योगपतियों की बैठक बुलाने की बजाय एक राष्ट्रीय पहल करनी चाहिए थी। एक व्यक्ति के अहम की बजह से राष्ट्रहित से किनारा नहीं किया जा सकता है।
बिजनेस भास्कर ने योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया और कई वरिष्ठ मंत्रियों से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने बात नहीं की क्योंकि उनको यह मुद्दा महत्वपूर्ण नहीं लगा। कांग्रेस और सरकार की ओर से सिर्फ पार्टी प्रवक्ता और गृह राज्य मंत्री शकील अहमद ने ही राय व्यक्त की। हालांकि वह आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ नहीं हैं। शकील अहमद कहते हैं कि सरकार चुनाव आयोग की सहमति के बाद किसी भी तरह के बड़े आर्थिक पैकेज की घोषणा भी कर सकती है।
किसी सर्वदलीय समिति की जरूरत इस मुद्दे पर नहीं है। चुनाव होने तक सरकार पूर्ण सरकार है। भारत के संविधान और निर्वाचन आयोग की नियमावली के तहत किसी भी स्थिति में और किसी भी वक्त देश, समाज और अर्थतंत्र से जुड़े मसलों पर सरकार को फैसला लेने का अधिकार है। आचार संहिता लागू होने की स्थिति में भी सरकार को सार्वजनिक महत्व के या इमरजेंसी मुद्दों पर फैसले लेने का अधिकार है। इस समय सरकार को सहयोग दे रही समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ सांसद मोहन सिंह कहते हैं कि आम सहमति की भावना की जरूरत है। अमेरिका में ओबामा और मैक्केन आर्थिक संकट सहित अनेक मुद्दों पर मिलकर बहस करते रहे, पर हमारे यहां सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री आर्थिक मसलों पर उद्योगपतियों की ही बैठक बुलाते हैं।
हालांकि मेरा मानना है कि चुनाव से ऐन पहले आर्थिक संकट से निपटने के नाम पर या कोई आपात फैसला लेने के लिए किसी सर्वदलीय कमेटी की जरूरत नहीं है। सरकार पूरे अधिकार वाली सरकार होती है। चुनाव की आचार संहिता नई नीतिगत मसलों के ऐलान पर प्रभावी होती है, जारी नीतियों के क्रियान्वयन पर नहीं। सरकार देश की जरूरत के हिसाब से बड़े फैसले पर कर सकती है। किसी बड़ी कंपनी या किसी सरकारी उपक्रम के दिवालिया होने की स्थिति में भी सरकार कोई बड़ा फैसला कर सकती है।
सारे रास्ते बंद हो तो वह इमर्जेन्सी प्रावधानों का इस्तेमाल कर सकती है। इस बारे में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के महासचिव शाहिद सिद्दीकी कहते हैं कि प्रधानमंत्री चाहें तो समय-समय पर दलों के शीर्ष नेताओं से संवाद कर सकते हैं। सरकार के पास चुनाव के दौरान भी जनता, अर्थतंत्र और समाज की हिफाजत के लिए ठोस कदम उठाने के सारे अधिकार हैं। केंद्र की सरकार कभी कामचलाऊ नहीं होती। आचार संहिता सिर्फ लोकभावन घोषणाओं और फैसलों पर रोक लगाती है। ऐसे में किसी सर्वदलीय कमेटी के सुझाव से मैं सहमत नहीं हूं। प्रधानमंत्री चाहें तो समय-समय पर आर्थिक या किसी अन्य बड़े मुद्दों पर राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं की बैठक बुला सकते हैं, उनसे मशविरा कर सकते हैं।
लेकिन हाल तक सरकार को बाहर से समर्थन दे रही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद गुरुदास दासगुप्ता का कहना है कि सरकार को सभी पार्टियों को साथ लेकर मौजूदा संकट से निबटना चाहिए। लोकसभा चुनाव और आचार संहिता से पहले ही सरकार को कुछ ठोस कदम उठाकर स्थितियों को सामान्य करने के प्रयास करने चाहिए। वैसे ज्यादातर नेता इस मुद्दे पर बयानबाजी ही कर रहे हैं, कोई सकारामत्क सुझाव नहीं दे रहा। भाजपा नेता अरूण जेटली का कहना है कि यह सरकार कोई फैसला नहीं ले रही है और देश को गर्त में धकेल रही है।
जहां तक लोकसभा चुनावों से जुड़े आचार संहिता का सवाल है तो सरकार नई घोषणाएं न करे लेकिन मंदी से उबारने के लिए सक्रियता तो दिखाएं। यह काम सरकार नहीं कर रही है। माकपा नेता नीलोत्पल बसु हर बड़े फैसले पर सभी दलों की सहमति के पक्षधर हैं। उनका कहना है कि अगर सरकार जनता के हित के लिए कोई फैसला लेती है तो चुनाव आयोग से इसकी अनुमति ले सकती है। वह कोई नई घोषणा न करे लेकिन आचार संहिता लागू होने की स्थिति से पहले कुछ ऐसा कदम उठाए ताकि संकट से निपटा जा सके। सरकार को यह फैसला सभी दलों की सर्वानुमति से लेना चाहिए ताकि कल कोई विरोध न हो।
भारतीय रिजर्व के पूर्व गर्वनर और सांसद बिमल जालान का कहना है कि चालू परियोजनाओं में सरकार को कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि नई परियोजनाओं के लिए सरकार सप्लीमेंटरी का रास्ता अख्तियार कर सकती है। लगता है राजनीतिक नेता मुद्दे की गंभीरता को समझ नहीं रहे। अगर चुनाव के दौरान कोई नया संकट आ खड़ा होता है (मान लीजिए कोई बैंक दिवालिया हो जाए, जैसा कि अमेरिका में हुआ) तो ऐसे में सरकार क्या कदम उठाएगी। हालांकि अर्थशास्त्री बात की गंभीरता को समझ रहे हैं।
इसी लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कुलपति डॉ. बी.बी. भट्टाचार्य कहते हैं कि चुनाव के मद्देनजर सरकार को एक कमेटी बनानी चाहिए जो चुनाव के दौरान भी विभिन्न आर्थिक मसलों पर तुरंत निर्णय करने और उसे लागू करने की क्षमता रखती हो। उनकी यह शिकायत भी है कि फिलहाल सरकार धीमे फैसले कर रही है। चुनाव के दौरान किसी भी आर्थिक मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए देश की सभी राजनीतिक पार्टियां एकमत होकर कमेटी बना सकती हैं। लेकिन इस मुद्दे पर भाजपा, कांग्रेस और लेफ्ट तीनों को एकमत होना पड़ेगा। मुझे नहीं लगता कि विपक्ष इस मुद्दे पर एकमत होगा।
आईआईपीए के पूर्व प्रोफेसर और वैकल्पिक आर्थिक सर्वेक्षण निकालने वाली संस्था के समन्वयक कमल नयन काबरा का भी कहना है कि सरकार को कुछ ऐसे कदम उठाने चाहिए जिससे चुनावी माहौल के दौरान कोई दिक्कत पेश न आए। अगर चुनाव के दौरान कोई आर्थिक संकट आता है तो सरकार चाहे तो देश की सभी पार्टियों और राज्यों के साथ मिलकर एक ऐसी कमेटी का गठन कर सकती है जो चुनावी माहौल के दौरान भी उतने ही कारगर कदम उठाए जितने कि सरकार उठा सकती है।
जेएनयू में अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख डॉ. अरुण कुमार का कहना है कि चुनाव आचार संहिता की अवधि में अहम फैसलों के लिए सर्वदलीय समिति जैसी किसी निकाय का गठन कभी हुआ नहीं है। अमेरिका जैसे देशों में भी भीषण आर्थिक संकट के दौरान चुनाव हुए हैं। आचार संहिता के दौरान भी सरकार के पास किसी तरह के संकट से निबटने के लिए नीतिगत फैसले लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता होती है। इस बहस से साफ है कि अर्थशास्त्रियों के विपरीत, राजनीतिक दल न तो मुद्दे की गंभीरता को समझ रहे हैं और न ही इस दिशा में किसी कदम की पहल दिखती है। जबकि जरूरत इस बात की है कि इस मसले पर चर्चा हो, कोई ठोस फैसला हो।