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क्या है ‘चंद्रयान-1’ अभियान : चंद्रयान-1 एक ऐसा अभियान है, जो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण सीढ़ी का काम करेगा। साथ ही ला खड़ा करेगा भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों के समक्ष, जिन्होंने अंतरिक्ष और चांद की गहराइयों को नापते हुए अपने आपको विश्व शक्ति के रूप में स्थापित किया है। चंद्रयान-1 भारत के अभी तक के अंतरिक्ष अनुसंधान में सबसे महत्वपूर्ण योजना है।
इस योजना के तहत चंद्रयान-1 भारत का पृथ्वी की कक्षा से बाहर चांद पर भेजा जाने वाला पहला अंतरिक्ष यान होगा। इसरो ने चंद्रयान-1 अभियान की घोषणा 2003 में की थी। यह अभियान यूरोपियन स्पेस एजेंसी के सहयोग से चल रहा है। दोनों एजेंसियों के बीच एक सहयोगी समझौता हुआ, जो जून 2005 में अस्तित्व में आया था।
यूरोपियन स्पेस एजेंसी इस अभियान में तीन यूरोपियन उपकरणों को को-ओर्डिनेट करेगी। इसके अलावा एजेंसी थर्मल डिजाइन, फ्लाइट डायनेमिक और आंकड़ों के संग्रहण और प्रोसेसिंग में भी मदद करेगी। इस अंतरिक्ष यान को अक्टूबर के अंत तक श्रीहरिकोटा से पोलर सैटेलाइट लॉंच व्हीकल कहलाने वाला पीएसएलवी-एक्सएल से छोड़े जाने की तैयारी है।
फिलहाल चंद्रयान का बैंगलोर स्थित इसरो सैटेलाइट सेंटर में विभिन्न चरणों के तहत परीक्षण किया जा रहा है। चंद्रयान-1 अपने साथ अंतरिक्ष अनुसंधान से संबंधित 11 उन्नत उपकरणों को भी लेकर जाएगा। इनमें से पांच उपकरण भारत से होंगे और बाकी के छह उपकरण विदेश से होंगे।
चंद्रयान-2 भी जल्द ही
भारत जल्द ही रूस के सहयोग से चंद्रयान-2 अभियान भी शुरू करेगा। भारत ने इस संबंध में रूस के साथ तकनीकी मुद्दों पर चर्चा शुरू कर दी है। इस अभियान के सन् 2012 तक अस्तित्व में आने की उम्मीद है। चंद्रयान-2 का मुख्य उद्देश्य चांद की सतह का रासायनिक परीक्षण करना होगा और अन्य महत्वपूर्ण स्रोत का भी पता लगाना होगा।
द्द यदि सब कुछ व्यवस्थित चला तो इसी महीने भारतीय ‘चंद्रयान-1’ अपने मिशन के लिए उड़ान भरेगा। फिलहाल वैज्ञानिकों ने इस बार यान में चांद के धरातल पर उतारने के लिए एक स्थिर उपकरण ही चुना है, लेकिन चंद्रयान-2 में भेजी जाने वाली ‘लूनर बग्घी’ चांद पर चार-पांच किमी का चक्कर लगाएगी। दोनों अभियानों की सफलता बनाएगी वो जमीन जिस पर भविष्य में कोई भारतवासी रखेगा कदम।
चंद्रयान मिशन-1
कब तक : अक्टूबर में लॉंचिंग के प्रयास
कितना खर्च : करीब 400 करोड़
क्या करेगा : दो साल तक चांद की परिक्रमा करेगा और एक उपकरण चांद पर उतारेगा।
फायदा क्या : चांद व पृथ्वी से जुड़ी भौगोलिक, वातावरण व अंतरिक्ष की जानकारी मिलेगी।
आगे क्या : अनुभव के आधार पर 2012 में प्रस्तावित चंद्रयान-2 में जाने वाली लूनर बग्घी को तैयार किया जाएगा। इस बग्घी में कार की तरह पहिए होंगे।
यह है उद्देश्य
>> चंद्रमा की 100 किमी की ऊंचाई पर परिक्रमा करेगा।
>> यह चंद्रमा के धरातल की बहुत उच्च क्वालिटी की फोटोग्राफी करेगा।
>> यह चंद्रमा के उद्भव, उत्पत्ति एवं वर्तमान स्थिति के बारे में समझने में मदद करेगा।
>> यह चंद्रमा की मिट््टी एवं उसकी भौगोलिक स्थिति का अध्ययन करेगा।
>> चांद की सतह से जुड़े भूविज्ञान, भूदृश्य और खनिज संबंधी विश्लेषण कर विस्तृत जानकारी जुटाना।
>> क्रिस्टल मैटेरियल का वर्टिकल निस्तारण में अध्ययन करना।
>> चांद पर बने ज्वालामुखी, घाटी और पहाड़ों के निर्माण प्रक्रिया की तहकीकात करना।
>> अंतरिक्ष मौसम प्रक्रिया की खोज करना।
>> चांद की सतह पर चुंबकीय एनोमलाइस का विश्लेषण करना।
>> चांद के ध्रुवों पर बर्फ की खोज करना।
>> वैज्ञानिक महत्व के लिहाज से चांद के विभिन्न क्षेत्रों के 3-डी नक्शे तैयार करना।
>> एक इंपेक्ट प्रॉब को चांद की सतह पर गिराना, ताकि सतह के करीब की विशेषता को जांचा जा सके।