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जालंधर
मंदी के इस दौर ने हर इंडस्ट्री को औंधे मुंह गिराया है। धीरे-धीरे अब हर सैक्टर इससे प्रभावित होने लगा है। ऐसे में पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री की गूंज भी धीमी हुई है। कभी एक पंजाबी एलबम हिट होने से रातों-रात करोड़पति बनने वाले पंजाबी गायक अब एलबम निकालने से भी बच रहे हैं। पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री से जुड़े लोग मानते हैं कि अगर आने वाले 5 सालों में यही आलम रहा था तो इंडस्ट्री दम तोड़ देगी। दम तोड़ रही पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री को अब मिलेनियम ईयर जैसे गोल्डन पीरियड का इंतजार है।
3 गुना बढ़ी एलबम कॉस्ट
प्लाज्मा रिकार्डस के एमडी दीपक बाली बताते हैं कि पहले एक एलबम को रिलीज करने में कंपनी 50 हजार रुपए लगाती थी, जो अब बढ़कर तीन गुना हो गया है। इसका बड़ा कारण वीडियो और प्रमोशन है। पहले एलबम की केवल ऑडियो तैयार की जाती थी और मार्केट में रिलीज से पहले प्रमोशन पर सिर्फ विजुअल पोस्टर का खर्च आता था। ज्यादा से ज्यादा पंजाबी सिंगर की वीडियो के केवल प्रमुख गीत की ही वीडियो तैयार की जाती थी, मगर अब बढ़ रही चैनल्स की डिमांड और कंपीटिशन के कारण एलबम के सभी गीतों की वीडियो तैयार करवानी पड़ती है। इसकी लोकेशन के लिए विदेशों में शूटिंग के चले ट्रैंड ने खर्चा तीन गुणा ज्यादा कर दिया है। एक म्यूजिक चैनल के चलते किसी एलबम की प्रमोशन करना आसान रहता था। चाहे वो वीडियो चलवाने की बात हो या प्रमोशनल एड की, मगर अब ज्यादा चैनल होने के कारण यह परेशानी बढ़ गई है और न चाहते हुए भी उन्हें सभी के लिए अपनी प्रमोशनल एक्टीविटी बढ़ानी पड़ती है।
खर्च बढ़ा, प्रॉफिट घटा
पंजाबी सिंगर मनमोहन वारिस बताते हैं कि हर एलबम में खर्च बढ़ रहा है, लेकिन प्रॉफिट कम होता जा रहा है। अब तो पूरे खर्च निकालने भी मुश्किल हो रहे हैं। अपने बजट को प्लान कर एलबम के बारे में सोचना पड़ता है। उन्होंने बताया कि इसी कारण कोई भी पंजाबी सिंगर चाहे वह कोई चोटी कलाकार ही क्यों न हो एलबम निकालने से पहले दस बार सोचता है। कई बार तो इन्हीं कारणों से अपनी एलबम रिलीज तक नहीं कर पाता। इसके साथ ही एलबम को बनाने में लगने वाले टाइम के बढ़ने के कारण ही मार्केट इफैक्ट हुई है। कॉस्ट ही नहीं बल्कि टाइम भी पांच गुना बढ़ा है। पहले एक बढ़िया एलबम तैयार करने में तीन हफ्ते का समय लगता था, लेकिन अब दोनों पांच गुना बढ़ गए हैं। इसके साथ ही म्यूजिशियन सहित अन्य खर्च भी बढ़ रहे हैं।
टेलैंट की बेकद्री
पंजाबी कलाकारों के टेलैंट का हर कोई कायल है, लेकिन दुखद बात यह है कि इस टेलैंट की वैल्यू उनकी अपनी सर जमीं पर ही नहीं पड़ रही। लगातार बढ़ रहे गायकों व खर्च की संख्या से पुराने सिंगर पर ही नहीं बल्कि जो असली टेलैंट है वह भी प्रभावित हो रहा है। कुछ सिंगर ज्यादा खर्च के कारण अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते। इसके साथ ही टॉप म्यूजिक कंपनियां भी उनके टेलैंट को पहचान करे बिना ही एलबम के लिए इनकार कर देती हैं। म्यूजिक इंडस्ट्री को करीब से जानने वाले जोबनप्रीत सिंह इस बात की पुष्टि करते हैं।
पायरेसी का जाल
पायरेसी म्यूजिक इंडस्ट्री को घुन की तरह अंदर ही अंदर खा रही है। मार्केट की मौजूदा स्थिति पहले से ही खराब है और बची कसर पायरेसी ने निकाल दी है, हालांकि म्यूजिक कंपनियां और गायकों ने इसे रोकने के लिए कंपनियां श्रोताओं को कम रेट पर सीडी और वीसीडी भी दे रही हैं, लेकिन पायरेसी पर कोई रोक नहीं लग पा रही है और न ही सरकार इसके लिए कड़े कदम उठा रही है। इससे इन कस्टमर्स को निजात नहीं मिल पा रही है। अगर पायरेसी पर ही रोक लग जाए तो म्यूजिक इंडस्ट्री को 70 प्रतिशत तक निजात मिल जाएगी।
पंजाब में गिरावट इसलिए
पंजाबी संगीत को बॉलीवुड में प्रमोट कर रहे सिंगर सलीम कहते हैं कि पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री को बालीवुड ने तो अपना हिस्सा बना लिया है, मगर यहां गिरावट आने लगी है। हर फिल्म में एक पंजाबी गीत को उन्होंने अपनी जरूरत बना लिया है, लेकिन दुखद पहलू है कि अपने बालीवुड के जरिए दुनिया की पसंद बन रहे पंजाबी म्यूजिक को अपने पंजाब में वह वैल्यू अब नहीं मिल पा रही है। हास्य कलाकार गुरप्रीत घुग्गी कहते हैं कि पंजाबी म्यूजिक को तो इस समय बेचना मुश्किल हो गया है। स्थिति यह है कि वीडियो-ऑडियो की क्वालिटी भी इफैक्ट हो रही है।
बस यही सहारा है
स्पीड रिकार्डस के डायरेक्टर बलविंदर सिंह रुबी बताते हैं कि पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री में मंदी के दौर में अगर साख या खर्च निकल रहे हैं तो वे रिंगटोन डाउनलोडिंग, एमएफ एक्सक्लूसिव सांग्स टाईअप और ऑनलाइन श्रोता हैं। इनकी मांग है कि प्रदेश सरकार इसमें हस्तक्षेप करते हुए कड़े कदम उठाए।
परेशानियां बढ़ने के कारण
>> बढ़ रहे म्यूजिक चैनल >> पायरेसी का जाल >> बढ़ते सिंगर घटती क्वालिटी >> हर गीत का वीडियो
यूं गिरा म्यूजिक इंडस्ट्री का ग्राफ
2000-02 100 प्रतिशत मार्केट (इंडस्ट्री उच्चतम स्तर पर पहुंची, विदेशों में डिमांड बढ़ने से कमाई डॉलर्स में)
2003-04 घटकर 80 प्रतिशत ही बची 2005-06
घटकर 60 प्रतिशत
2006-07
घटकर 40 प्रतिशत
2007-08
में कारोबार 30 प्रतिशत से भी कम
(यह ग्राफ म्यूजिक इंडस्ट्री से जुड़े कैसेट कंपनियों के सर्वेक्षणों पर आधारित है)