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साकार करें खुली आंखों का सपना

अमृतसर रतन टाटा ने छोटी और एक लाख की कार का सपना देखा। शायद इसे बार-बार देखते रहे हांेगे। फिर अपने इंजीनियरों से सलाह की। उन्होंने कार का डिजाइन और फिर माडल बनाया। वक्त धीरे-धीरे बीतता गया और रा-मटीरियल की कास्ट भी बढ़ती गई। पर रतन टाटा का तो सपना था, छोटी और एक लाख की कार बनाना। अगर वो ऐसा ना करते तो सारा विश्व उन पर हंसता और कटाक्ष करता की सपना रीयल लाइफ में सच नहीं हुआ। रतन टाटा ने हिम्मत नहीं हारी और नैनों में बैठकर लोगों के सामने प्रदर्शनी में आए। सभी दंग रह गए। रतन टाटा का हौसला और हिम्मत भी इस्पात की तरह दृढ़ है।

वैज्ञानिक भी देखते हैं सपने

हर वैज्ञानिक की सोच अविष्कार से पहले सपने की तरह ही होती है, क्योंकि वो भी खुली आंखों से सपने देखते हंै? ऐसा वो हर रोज कई बार करते हंै। इससे उनके दिमाग के चित्रपट पर बिल्कुल स्पष्ट तस्वीर बन जाती है। फिर रीयल लाइफ में इसे पूरा करने के लिए दिन -रात कड़ी मेहनत करते रहते हैं।

फोर्ड ने देखा कार का सपना

सर हैनरी फोर्ड ने सबसे पहले कार में सवारी करने का सपना देखा, फिर उसे साकार करने के लिए एक कमरे में कार बनाने लगे। दिन-रात मेहनत के बाद जब कार बनकर तैयार हुई, तो दरवाजे से बाहर कैसे आती। फोर्ड तो कार के सपने को साकार करने में यह भूल ही गए। कार बनने के बाद बाहर कैसे आएगी? फिर दीवार ही तोड़नी पड़ी और कार को चला कर सपना रीयल लाइफ में साकार किया।

राइट ब्रदर्स की उड़ान

राइट ब्रदर्स पक्षियों को आसमान में उड़ता देख उन्हीं की तरह उड़ने का सपना दिन-रात देखने लगे। सपनों साकार करने को वर्र्षो मेहनत की। फिर एक दिन अपने बनाये विमान में आकाश में उड़ने लगे, तो विश्व हैरान था।

आंखंे कैसे देखती हैं?

डा. संदीप राणा आई स्पेशलिस्ट ने बताया कि हमारी आंखें जो भी देखती है, उसका चित्र हमारे दिमाग के पिछले हिस्से जिसे आक्सिपटल कहते हंै, वहां बनता है। फिर दिमाग उसे प्रोसेस करता है। इस तरह आंखों द्वारा देखी गई इमेज दिमाग द्वारा पहचान ली जाती है। किसी भी चीज को बड़े ध्यान से बार-बार देखने से उसका इमेज दिमाग के चित्रपट पर पक्की बन जाती है। शायद वैज्ञानिक इसलिए खुली आंखों से बार-बार सपने देखते हंै और नई-नई खोज कर सबको आश्चर्यचकित कर देते हैं।

(लेखक वास्तु एक्सपर्ट हैं।)





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