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लुधियाना पंजाब सरकार ने स्कूली बच्चों को एड्स के बारे में जागरूक करने के मकसद से तीन तरह की डेढ़ लाख किताबें छपवाईं। बाद में खुद ही उन्हें अश्लील करार देकर डंप भी करा दिया। किताबों के प्रकाशन पर तीस लाख रुपये खर्च हुए थे। इस नुकसान की भरपाई कैसे और किससे होगी, इस पर सब चुप्पी साधे हुए हैं।
सवाल यह भी है कि प्रकाशन से पहले सेहतमंत्री व शिक्षामंत्री को किताब क्यों नहीं दिखाई गई। किताब का मॉडल नेशनल एड्स कंट्रोल सोसायटी ने भेजा था, जिस पर पंजाब की आपत्ति के बाद केंद्र का मानव संसाधन विकास विभाग अब किताब को रिव्यू कर दोबारा भेज रहा है।
स्कूल एड्स अवेयरनेस प्रोग्राम के तहत नेशनल एड्स कंट्रोल सोसायटी पंजाब को तीन किताबों का हिंदी वर्जन मॉडल के तौर पर भेजा था, जिसे राज्य सरकार स्थानीय भाषा में प्रकाशित करवाकर स्कूलों में बांटना था। स्क्रिप्ट पर आधारित एक किताब बच्चों को बांटी जानी थी, जबकि दो किताबें टीचर्स को दी जानी थी ताकि वे बच्चों को समझा सकें।
इनमें से एक किताब में कुछ स्केच थे। बताते हैं कि यह किताब नजर में आने पर सेहतमंत्री प्रोफेसर लक्ष्मीकांता चावला ने आपत्ति जताई। उनका मानना था कि इन किताबों की स्क्रिप्ट व स्केच स्कूली बच्चों के देखने के लायक नहीं हैं। इसके बाद किताब के वितरण को रोक दिया गया।
प्रकाशन से पहले क्यों नहीं पड़ी नजर?: इससे पहले पंजाब स्टेट एड्स कंट्रोल सोसायटी ने टेंडर आमंत्रित कर तीन प्रकाशन कंपनियों को आर्डर देकर करीब पंजाबी वर्जन की डेढ़ लाख से अधिक किताबें तैयार करा चुकी थी। इस प्रक्रिया में किताब का मॉडल व मैटर कई अफसरों के हाथों से गुजरा लेकिन किसी को उसमें बुराई नजर नहीं आई?
स्कूल एड्स अवेयरनेस प्रोजेक्ट सेहत विभाग व शिक्षा विभाग का संयुक्त प्रोजेक्ट है। जो किताबें आई थी, उसकी सामग्री पर कई राज्यों ने आपत्ति जताई। पंजाब में भी शिक्षामंत्री व सेहतमंत्री की आपत्ति के बाद सरकार ने इसका वितरण रोक दिया। किताबों में छपी सामग्री केवल बच्चों के लिए आपत्तिजनक मानी गई है, वयस्कों के लिए नहीं। इसलिए सोसायटी किताबों को डंप करने की बजाय व्यस्कों व एनजीओ वर्करों में बांट रही है ताकि वे उससे लोगों को जागरूक कर सकें। -एमएन शर्मा, एडिशनल प्रोजेक्ट डायरेक्टर पंजाब एड्स कंट्रोल सोसायटी