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आपस की बात.
पिछले दिनों एक छोटा सा समाचार प्रकाशित हुआ और उस पर यूं ही नजर पड़ गई। चार पंक्तियों के समाचार में लिखा था कि आनंदी की कहानी को देखने के लिए राजस्थान के कई गांवों में टीवी खरीदा जा रहा है और केबल कनैक्शन लेने के लिए परिवार बहुत उत्सुक हैं।
वे इसकी कीमत सिर्फ इसलिए देना चाहते हैं कि आनंदी की बात उनके अपने परिवेश से जुड़ी लगती है।
यह उनका पर्याय है जिसे वहां की महिलाओं ने भोगा है। कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक बालिका वधू के बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
यह अब घर-घर की कहानी हो गई है। आनंदी और उस पात्र के कथानक से गांव ही नहीं, शहरी महिलाएं भी एकात्मकता का अनुभव कर रही हैं।
दरअसल, महिलाएं उसमें उस त्रासदयी स्थितियों से जूझती, संघर्ष करती बालिकाओं के प्रति असीम सहानुभूति से भरी हुई हैं और उनकी पीड़ा को आत्मसात कर रही हैं। यह दीगर बात है कि आजादी के इतने वर्षो बाद भी गांवों में महिलाओं की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। आखातीज पर कई बच्चों के विवाह कर दिए जाते हैं।
हर साल ऐसे चित्र समाचार पत्रों में प्रकाशित होते हैं जिनमें सात या आठ साल का दूल्हा तलवार लटकाए, माथे पर मौर बांधे पांच या छह वर्ष की बालिका वधू के साथ बैठा होता है। महिलाएं सुहाग और विदाई के गीत गाती रहती हैं।
इस गैर कानूनी प्रथा के दुष्परिणामों का बहुत सशक्त चित्रण बालिका वधू में हुआ है। हालांकि बालिका वधू के कथानक पर दो बार बनी फिल्म में किशोरावस्था के विवाह का महिमामंडन किया गया था, पर टीवी के वर्तमान कथानक में बच्चों की मासूम और कोमल आयु में विवाह होने की बुराई के प्रति जागरूक होने की बात बहुत ईमानदारी से कही गई है।
यदि राजस्थान के गांवों के परिवार टीवी खरीदकर बालिका वधू को देखने के लिए ही टीवी खरीद रहे हैं तो यह उस बुराई को जानने और समझने के प्रति उनकी जागरूकता की निशानी है। यदि वे इस बुराई को समझ पाए तो बहुत बड़ी क्रांति होगी। जिस कुरीति, रूढ़िवादिता को कानून नहीं दूर कर सका उसे एक टीवी सीरियल अपने सशक्त चित्रण से बदल दे तो टैलीविजन की सार्थकता समझी जा सकती है।
दरअसल, बाजारवाद समाज के यथार्थ और वास्तविकता को कभी समझ नहीं सकता। टीवी के सशक्त माध्यम पर भी बाजार ने ऐसी प्रभुता जमाई की वह केवल महिलाओं की और पुरुषों की दुष्प्रवृत्तियों, कामुकता वैभव के अनैतिक प्रदर्शन का जरिया बनकर रह गया। एक इंटेलिजिएंट, ज्ञानवर्धक प्रसारण का माध्यम बुद्धूबक्सा बन गया।
यदि आनंदी ने गांवों में अपनी पैठ बना ली तो यह उसी बक्से का सदुपयोग हो गया। महिला सशक्तिकरण और उनके सोच के बदलाव, सामाजिक परिवेश में गैर जरूरी पारंपरिक प्रवृत्तियों को दूर करने में ऐसे ही प्रसारणों की दरकार है।
काश! चैनल्स अपना सामाजिक उत्तरदायित्व समझें। उनका हित भी इसी में है कि वे आनंदी जैसे मनोरंजक संदेशों के कथानकों से अपना टीआरपी रेट भी बढ़ा लें।