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शब्दों के रोमांच से समझौता

जालंधर. प्रतिबंधित किताबों के पायरेटेड वर्जन को पढ़ने के बाद अपने लक्ष्य से डायवर्ट हुआ युवा मानसिक रूप से हिंसक होकर जीवन को दांव पर लगा देता है। कुछ ऐसा ही चित्रण बुकर पुरस्कार विजेता अरविंद अड़िगा की नई किताब ‘बिटविन द असेसिनेशन’ में किया गया है।

शहर में रेलवे स्टेशन व बस स्टैंड के पास 30 से 35 दुकानों पर बैस्ट सेलर्स व लिटरेचर की किताबें आसानी से मिल रही हैं। इतना ही नहीं यहां मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग सहित अन्य सब्जैक्ट्स की महत्वपूर्ण किताबों की पायरेसी भी हो रही है। पब्लिशर्स और लेखक दोनों को ही इससे भारी नुकसान हो रहा है।

किताबों के शौकीन आदर्श नगर निवासी सिमरनदीप सिंह कहते हैं कि पायरेटेड किताबें पल्प फिक्शन की तरह होती हैं, जिन्हें हाथ में लेते ही खराब प्रिंट व लेआउट के साथ लुगदी से बने कागज की फीलिंग आती है। पायरेसी में ओरिजनल टेक्स्ट भी कटे होते हैं। इससे फिक्शन को पढ़ते समय कहानी से रिलेट करना ही मुश्किल हो जाता है। इन्हें कई दफा ऐसी परेशानी का भी सामना करना पड़ा है कि किताब में कुछ पन्ने ही नहीं होते हैं।

इकोनॉमिकल रीडर्स के लिए

रीडर्स पैरेडाइज के मैनेजिंग पार्टनर एसके शर्मा मानते हैं कि शहर की बुक मार्केट में 10 से 12 फीसदी पायरेसी किताबें बिक रही हैं, लेकिन ये केवल इकोनॉमिकल रीडर्स को ही आकर्षित करती हैं। किताबों को समझने व लेखक की भावनाओं के करीब पहुंचने की इच्छा रखने वाले रीडर्स ओरिजनल टेक्स्ट ही पसंद करते हैं।

ट्रैवलर्स देते हैं बढ़ावा

पायरेटेड बुक्स की खरीद को ट्रैवलर्स बढ़ावा देते हैं। यह बात रेलवे स्टेशन व बस स्टैंड पर बुक स्टॉल चलाने वाले मानते हैं। सिटी रिपोर्टर ने इन बुक स्टॉल संचालकों से बात की तो उन्होंने कहा कि सौ में से 95 यात्री सस्ती मगर नामी राइटर की किताब मांगते हैं। ऐसे में अगर उन्हें बता भी दिया जाए कि उनके पास सिर्फ ओरिजनल वर्जन है तब भी वे पायरेटेड वर्जन की उम्मीद करते हैं। उनका तर्क होता है सफर में टाइम पास के लिए ही तो चाहिए। ऐसे में उन्हें पायरेटेड वर्जन मजबूरन रखने पड़ते हैं।

माई हीरां गेट स्थित बुक कॉर्नर के समीर बताते हैं कि पायरेसी न हो इसलिए वे पॉकेट साइज में भी बुक प्रिंट करते हैं, जो सस्ती भी पड़ती है। इनका तर्क है कि बुक पायरेसी रोकने के लिए रायटर व पब्लिशर्स को मिलकर प्रयास करने होंगे। तभी यह समस्या सॉल्व हो सकती है।

इस तरह से भी पायरेसी

लेखक प्रताप सिंह सोढ़ी बताते हैं कि कानूनन किसी लेखक के विचार को उसकी अपनी संपदा माना जाता है। इसे कॉपीराइट अधिकार के बिना प्रयोग करना अपराध की श्रेणी में आता है, मगर अब किताब ही नहीं इंटरनैट के जरिए भी किताबों की पायरेसी की जा रही है। इनके मुताबिक इंटरनैट पर किताब के कुछ अंश डालना, किताब के मुख्य अंशों को कम कर शेष को हल्के कागज पर प्रकाशित करना भी पायरेसी में शामिल है।

सबसे ज्यादा पायरेसी इनकी>> बैस्ट सैलर >> नामी डिक्शनरीज >> टैक्निकल किताबें>> एजूकेशनल फील्ड में पायरेसी

पायरेटेड बुक मार्केट का स्टेटस

>> 25 फीसदी पायरेटेड किताबें

>> 15 फीसदी टैक्निकल कोर्सेस की किताबें

>> 10 फीसदी लिटरेचर, बैस्ट सेलर व मोटिवेशनल किताबें





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