Breaking News 
bhaskar Web English


HomeNewsChhattisgarhRaipur Raipur

डाक्टरों की जिद ने जिंदगी बख्शी

रायपुर. oparation बालोद में खेती किसानी करने वाले जगत ठाकुर और पत्नी विमला का एक बेटा पहले से है। दूसरी बार उसने बालोद के सरकारी अस्पताल में जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। लेकिन ये बच्चे स्यामी जुड़वां थे। इनमें से एक विकसित था और दूसरे के दिल और फेफड़े नहीं थे। दोनों सीने से जुड़े हुए थे।

घबराए मां बाप उसे जगदलपुर ले गए। वहां के डाक्टरों ने पड़ताल की और बच्चों को रायपुर ले जाने की सलाह दी। आंबेडकर अस्पताल में बच्चों का परीक्षण कर डाक्टर इस नतीजे पर पहुंचे कि विकसित बच्चे की जान बचाने के लिए आपरेशन कर दोनों बच्चों को अलग करना अच्छा होगा। यह एक जटिल और चुनौतीपूर्ण काम था। आंबेडकर अस्पताल के डाक्टरों ने इस चुनौती को स्वीकार किया। बच्चे कमजोर थे, इसलिए उन्हें कुछ दिन अस्पताल में रखा गया। उनकी सेहत में सुधार आया।

इस बीच डा. अमीन मेमन के नेतृत्व में डाक्टरों ने काफी तैयारी की। आपरेशन के लिए 25 नवंबर का दिन तय किया गया। इस आपरेशन की खबर मीडिया के जरिए लोगों को हो गई थी। उत्सुक लोग अस्पताल में जमा हो गए थे। सबको इस चुनौतीपूर्ण आपरेशन के नतीजे का इंतजार था।

सुबह 10 बजे बच्चों को आपरेशन थिएटर में लाया गया। एनेस्थीसिया के एचओडी डा. केपी दुबे, डा. विनोद सिंह, डा. संदीप चंद्राकर, डा. नरेंद्र नरसिंग, डा. अमित जैन व पांच सहयोगी डाक्टरों की टीम डा. मेमन के नेतृत्व में मौजूद थी। सर्जरी के एचओडी डा. अशोक शर्मा भी मौके पर मौजूद थे।

आपरेशन चैलेंज था
सर्जरी साढ़े चार घंटे चली। यह बेहद चुनौतीपूर्ण आपरेशन था। बच्चों की अंतड़ियां और सीने की हड्डियां जुड़ी थीं। उन्हें काटकर अलग करते समय इसका ध्यान रखना था कि अंतड़ियों को नुकसान न पहुंचे। खून की नली कटने से अगर ज्यादा ब्लीडिंग होती तो भी बच्चे को बचाना कठिन हो जाता। डाक्टरों के धीरज और कौशल की जीत हुई।

खिले चेहरे
आपरेशन थिएटर के बाहर बेचैनी का आलम था। बच्चों के रिश्तेदार तो बेचैन थे ही, अस्पताल का स्टाफ और खबर पढ़कर पहुंचे लोग भी उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे। दोपहर दो बजे ओटी का दरवाजा खुला और एसेस्थीसिया के डाक्टर बाहर आए। ढाई बजे खबर बाहर आई कि सर्जरी पूरी हो चुकी है। पौने तीन बजे डा. शर्मा और डा. मेमन बाहर आए। फिर पूरी टीम बाहर आई। उत्सुक लोगों और मीडिया ने उन्हें घेर लिया। जीवित बच्चे को साढ़े चार बजे आपरेशन थिएटर से निकाला गया। उसे नर्सरी में रखा गया है जहां तीन डाक्टरों की टीम उसकी निगरानी के लिए तैनात की गई है।

मां बाप खुश हैं
बच्चे के मां-बाप खुश हैं। उनके बचे हुए बच्चे का जीवन कुछ आसान हो जाएगा। हालांकि उसके दिल में छेद है जिसका आगे चलकर उसे आपरेशन करवाना पड़ेगा। मां-बाप को अपना एक बच्च खोने का गम है। लेकिन डाक्टरों ने उसकी स्थिति पहले ही समझा दी थी।

जुड़े रहते तो क्या होता
डाक्टरों ने बताया कि बच्चे अगर जुड़े रहते तो विकसित बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होती। जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती, यह तकलीफ बढ़ती जाती और उसकी मौत का कारण बन सकती थी। दूसरे बच्चे का विकास नहीं हो पाया था। वह जन्म के पहले मर चुका था।

खर्च सरकार के खाते से
यह आपरेशन अगर निजी अस्पताल में किया जाता तो एक-डेढ़ लाख रुपए खर्च बैठता। आंबेडकर अस्पताल में हुए इस आपरेशन का खर्च शासन के वहन किया है। महंगी दवाएं अस्पताल से मिली हैं। आगे भी यहां जो खर्च होगा, वह बच्चे के मां बाप को नहीं उठाना होगा।

जिनकी जिद ने तकदीर बदली

आंबेडकर अस्पताल के जिन डाक्टरों ने इस आपरेशन को कामयाब किया वे हैं-

>> डा. अशोक शर्मा, एचओडी सर्जरी विभाग (मार्गदर्शक)
>> डा. अमीन मेमन, पीडियाट्रिक सर्जन (नेतृत्वकर्ता)
>> डा. विनोद सिंह, सर्जन
>> डा. नरेंद्र नरसिंग, सर्जन
>> डा. अमित जैन, सर्जन
>> डा. संदीप चंद्राकर, सर्जन
>> डा. केपी दुबे, एचओडी एनेस्थीसिया
>> डा. प्रतिभा शाह, एनेस्थैटिक सर्जन
>> डा. जया लालवानी, एनेस्थैटिक सर्जन
>> डा. एएम लकरा, एनेस्थैटिक सर्जन
>> डा. संजय गोयल, एनेस्थैटिक सर्जन
>> डा. ओपी सुंदरानी, एनेस्थैटिक सर्जन
>> डा. दुर्गाशंकर पटेल, एने्स्थैटिक सर्जन
>> डा. रश्मि, एनेस्थैटिक सर्जन

डाक्टरों को देश भर से उनके साथी डाक्टरों के बधाई संदेश मिल रहे हैं। बच्चे के मां बाप की दुआएं तो उन्हें शायद आजीवन मिलती रहेंगी।

कब क्या हुआ

>> सुबह 10 बजे बच्चों को पेइंग वार्ड से ओटी ले जाया गया।
>> एक घंटे तक जरूरी टेस्ट किए गए।
>> 11 बजे एनेस्थीसिया की प्रक्रिया शुरू हुई।
>> 11 बजे सर्जरी शुरू की गई।
>> 2 बजे निश्चेतना के डाक्टर बाहर आए।
>> 2.30 बजे डाक्टर ने सर्जरी पूरी होने की जानकारी दी।
>> 2.45 बजे डा. शर्मा व डा. मेमन बाहर आए।
>> ओटी के बाहर खड़ी भीड़ की ओर इशारा किया और कहा हम कुछ देर में आ रहे हैं।
>> 4.30 बजे स्ट्रेचर पर जीवित बच्चे को नर्सरी ले जाया गया।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: