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विदेश मंत्री का नेपाल दौरा

संपादकीय. विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी का तीन दिवसीय नेपाल दौरा कई कारणों से कूटनयिक हलकों में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। माओवादियों की सरकार गठन के बाद विदेश मंत्री की यह पहली नेपाल यात्रा है।

चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा रेखा को लेकर कई स्तरों पर बातचीत होती रही है, लेकिन दुयरेग से कोई बेहतर नतीजा अब तक हासिल नहीं हुआ। नेपाल के साथ सीमा रेखा को लेकर होने वाली बातचीत के प्रति विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने उम्मीद जताई है कि नई सीमा रेखा का 98 फीसदी काम पूरा हो चुका है और एक-दो सुधारों के बाद नए मानचित्र पर शीघ्र हस्ताक्षर हो जाएंगे। नेपाल से भारत की 1800 किलोमीटर लंबी खुली सीमा अकसर दोनों देशों के बीच विवाद का कारण बनती रही है।

खास तौर पर नेपाल के नवलपरासी एवं धारचुला के कालापानी क्षेत्र में सीमा निर्धारण को लेकर स्थिति विवादास्पद रही है। चूंकि भारत तराई क्षेत्र में सीमा निर्धारण करने को लेकर पहले से ही तैयार है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि बाकी जगहों के बारे में भी सहमति बन जाएगी।

नेपाल के नेता 58 साल पुरानी मैत्री संधि की समीक्षा करने की बात काफी पहले से करते रहे हैं, इसलिए वक्त की नजाकत को ध्यान में रखते हुए विदेश मंत्री जल ऊर्जा संसाधनों पर भी चर्चा करेंगे। नेपाल के कुसहा के समीप कोसी नदी का पूर्वी तटबंध टूटने से बिहार के पांच जिलों में भारी तबाही हुई है और कई जिलों के खेत रेत के टीलों में तब्दील हो गए हैं। जिसके बाद इस संबंध में नेपाल से बातचीत के लिए केंद्र सरकार पर जो दबाव था, उसके संबंध में नेपाली प्रधानमंत्री के साथ बेहद सकारात्मक बातचीत के बाद यह सहमति हुई कि कोसी बांध की मरम्मत का काम अगले साल मार्च तक पूरा कर लिया जाएगा, जिसके बाद कहा जा रहा है कि कोसी नदी अपनी मूल धारा में लौट आएगी।

माओवादी पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में इस दल के छह सौ प्रतिनिधि नेपाल में बहुदलीय लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की योजना के पक्ष में थे, जबकि इस दल के कुछ कट्टर नेता चीन के समान एकदलीय साम्यवादी शासन के पक्ष में हैं। नेपाली सेना में माओवादियों की भर्ती को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष में गहरे मतभेद हैं, इसलिए नेपाल का खास आग्रह था कि भारतीय विदेश मंत्री इस मसले को सुलझाने की दिशा में पहल करें।

जाहिर है, इसलिए विदेश मंत्री ने अपने इस दौरे में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला से सहमति के आधार पर नेपाली सेना और माओवादियों की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में विलय का आग्रह किया। उन्होंने भारतीय कंपनियों के निवेश के लिए नेपाल से उपयुक्त माहौल बनाने और नेपाली धरती से भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को लेकर भी बातचीत की। उम्मीद की जाना चाहिए कि दोनों देशों के बीच जो लंबे सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं, उसमें और मजबूती आएगी।





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