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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior शिवपुरी. केन्द्र समेत प्रदेश की सरकारें बच्चों के हित में किए जाने वाले कामों का कितना भी बखान करें लेकिन प्रदेश के बच्चों ने संयुक्त राष्ट्रसंघ को भेजी जाने वाली वैकल्पिक बाल अधिकार रिपोर्ट में कहा है कि मप्र में बच्चों का हाल ठीक नही है। प्रदेश के कई जिलों में तो हर साल हजारों बच्चे बीमारी के चलते काल के गाल में समा जाते हैं। इसके अलावा उन्हें सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं मिल ही नहीं पा रही है। रिपोर्ट में तो यहां तक कहा गया है कि प्रदेश के केवल पांच प्रतिशत बच्चे ही सरकारी सुविधाओं का लाभ ले पा रहे है।
मप्र समेत देश के 20 अन्य राज्यों में वैकल्पिक बाल अधिकार प्रतिवेदन तैयार करने का जिम्मा देश की जानी मानी स्वंयसेवी संस्थाओं ने अपने-अपने प्रदेश के चुनिंदा बच्चों को जून 2008 में सौंपा था। इसके तहत बच्चों से कहा गया था कि वह प्रदेश के ऐसे जिलों में जाकर बच्चों पर होने वाले अत्याचार शोषण के बारे में पता करें जहां उनके हालात ठीक नही है।
जिम्मेदारी के तहत जब प्रदेश के 32 बच्चो ने सर्वे किया तो यह तथ्य उजागर हुए कि संभाग के चार जिलों शिवपुरी, श्योपुर, अशोकनगर और ग्वालियर जिलों में बच्चों के हालात ठीक नही है। यहां तक कि श्योपुर और शिवपुरी में तो दर्जनों बच्चों की बीमारी के कारण मौत हो गई। इसी तरह रिपोर्ट मे यह बात सामने आई कि प्रदेश के अन्य जिलों भोपाल ,पन्ना, गुना समेत देश के अन्य 19 राज्यों में भी बच्चों की हालत चिंताजनक है।
गांव-गांव जाकर किए गए इस सर्वे में देश के आन्ध्र प्रदेश, असम, बिहार, दिल्ली, गोवा, गुजरात, झारखंड, कर्नाटिका, केरल, मप्र, महाराष्ट्र, मणिपुर, मिजोरम, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तराखंड और मेघालय में भी बच्चों के हाल ठीक नहीं बताए है। बच्चों की इस रिपोर्ट की तुलना केन्द्र सरकार द्वारा संयुक्त राष्ट्रसंघ को भेजी जाने वाले बाल अधिकार प्रतिवेदन से की जाएगी। इसी तुलना के आधार पर यूनिसेफ कार्यालय केन्द्र सरकार को फंड आवंटित करेगा।
क्या है बाल अधिकार प्रतिवेदन
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 20 नवंबर 1989 को बाल अधिकार घोषणा अधिनियम पारित किया गया था। इस अधिनियम को भारत सरकार ने भी 12 नवंबर 1992 को स्वीकार कर इस पर हस्ताक्षर कर दिए थे।
इसका उद्देश्य था कि इसमें शामिल प्रत्येक देश अपने देश के बच्चों के विकास के लिए घोषणा पत्र में उल्लेखित नियमों, प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए बच्चों के हित में नियम बनाएंगे और प्रत्येक पांच साल में बच्चों के लिए किए जाने वाले कामों की रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्रसंघ को भेजेगा इसी के आधार पर यूएन की संस्था यूनिसेफ संबंधित देश को बच्चों के लिए बजट आवंटित करेगा, लेकिन इस खर्च और बच्चों की हालत की निष्पक्ष जानकारी उन्हें हर पांच साल में यूएन को देनी होगी।
समय पर नहीं पहुंच सकी सरकारी रिपोर्ट
बाल श्रम विरोधी अभियान (सीएसीएल) के संयोजक संदेश बंसल ने बताया कि यूं तो हर पांच साल में संयुक्त राष्ट संघ को केन्द्र के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा बाल अधिकार प्रतिवेदन 20 जुलाई तक जिनेवा भेजी जानी थी, लेकिन इस बार यह प्रतिवेदन इस समय सीमा में नहीं भेजा जा सका। सीएसीएल द्वारा सरकारी रिपोर्ट भेजने के बाद ही बच्चों द्वारा तैयार वैकल्पिक बाल अधिकार प्रतिवेदन संयुक्त राष्ट्र संघ को भेजा जाएगा, क्योंकि जिनेवा में सरकारी रिपोर्ट और बच्चों द्वारा खुद तैयार की गई रिपोर्ट का मिलान होकर ही आगामी वर्षो की कार्ययोजना तैयार की जाएगी।
सर्वे में क्या पाया बच्चों ने?
प्रदेश के 32 समेत देश के 20 राज्यों के एक हजार बच्चों ने जून से अक्टूबर तक किए गए सर्वे में पाया कि ग्वालियर संभाग के देश क ा हर दसवां बच्च किसी न किसी रूप में अक्षमता का शिकार है। इसके अलावा उन्हें समाज में समान अधिकार सेवाएं और संरक्षण सुलभ नहीं है।
वहीं केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा बनाई गई नीतियों, योजनाओं, बजट और रचनात्मक कार्यक्रमों में उन्हें पर्याप्त तबज्जो नहीं दी जा रही। साथ ही बच्चों का उत्पीड़न और उनके प्रति हिंसा भी की जा रही है। सर्वे में जो खास बात सामने आई है वह है कुल बच्चों में से आधे ही प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर पा रहे है और उनके स्वास्थ्य के प्रति भी सरकारें गंभीर नहीं है। इसकी पुष्टि सीएसीएल के पदाधिकारियों ने भी की है।