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भारतीय राजसत्ता को चुनौती है यह आतंकी हमला

देश में आतंकवादी घटनाएं संख्या और गंभीरता दोनों में बढ़ती जा रही हैं और अब इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से भी ज्यादा भारत आतंकवाद से पीड़ित है। कहा तो यह जाता है कि हमारे पास आतंकवाद से लड़ने का लंबा अनुभव है लेकिन हर आतंकवादी हमला हमारी कमजोरियां उजागर कर जाता है।

यूं तो भारत १९५४-५५ से ही नगा, मिजो जैसे अनेक विद्रोहों से मुकाबिल रहा है, इसी आधार पर कहा जाता है कि ५क् के दशक से भारत को आतंकवाद से निबटने का अनुभव है, लेकिन दिनोंदिन आतंकवाद की उग्रता बढ़ती जा रही है और हमारी उसके खिलाफ तैयारी धरी की धरी रह जाती है। आतंकवाद के यूं तो कई रंग हैं, मसलन पूर्वोत्तर राज्यों में एक तरह की जातीय बगावत है, तो दूसरा नक्सलवादियों के कुछ क्षेत्रों में गढ़ हैं। लेकिन सबसे खतरनाक जेहादी आतंकवाद है।

यह पहले जम्मू-कश्मीर तक सीमित था, अब समूचे देश में फैल गया है और इसके कुछ स्थानीय संस्करण भी तैयार हो गए हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सिमी जैसे संगठन हैं। सिमी के अगुवा नागौरी ने यह कहा भी है कि कुरान ही उनका संविधान है और शरीयत ही कानून। यानी देश के संविधान और कानून से अधिक महत्व उनके लिए अलकायदा के फलसफे का है। ऐसी मानसिकता से ग्रस्त हमारे यहां के लड़के, हालांकि पैदल सिपाही की भूमिका में ही होते हैं। नेतृत्व, निर्देशन, आर्थिक संयोजन, योजना और रणनीति तैयार करने का काम तो बाहरी तत्वों के ही हाथ होता है। चाहे वह आईएसआई हो या लश्कर जैसे संगठन।

असल में इन आतंकवादियों को भारत में हमले करना कई तरह से आसान मालूम पड़ता है, क्योंकि उन्हें अहसास है कि भारत में आतंकवाद से लड़ने का दृढ़ संकल्प नहीं है। अभी तक यहां आतंकवाद के खिलाफ कोई कानून नहीं है। इसलिए वे सोचते हैं कि यहां घटनाओं को अंजाम देने में खतरा सबसे कम है। शायद पुलिस से पकड़े जाने का भी डर कम है और पकड़े भी गए तो अदालत से छूट जाने की संभावना रहती है। यही नहीं, अगर फांसी भी हो जाए तो उस पर अमल होना मुश्किल हो जाता है। तमाम तरह के मानवाधिकारवादी संगठन सवाल खड़े करने लगते हैं। इस तरह आतंकवादियों का घटनाओं को अंजाम देने में दुस्साहस लगातार बढ़ता जा रहा है। मुंबई की घटना इसकी गवाह है।

इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी से लगता है कि ये आतंकवादी समुद्री रास्ते से आए, छह-सात जगहों पर बम विस्फोट किया और बेरोकटोक संवेदनशील इलाकों में पहुंचे। इनकी तादाद १५ से २५ तक बताई जाती है। यह सब ताजमहल और ओबेराय होटल में घुसने के पहले काफी देर तक चलता रहा। इस पूरी घटना को देखकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आतंकवादियों ने देश की राजसत्ता को सीधे चुनौती दी। उन्हें पुलिस, फौज कोई रोक नहीं पाया। यह हमारे समूचे तंत्र को चुनौती है। इसमें स्थानीय भी हो सकते हैं, लेकिन उनका कोर ग्रुप विदेशी जेहादियों का है। उनका नियंत्रण विदेशी तंत्र के जिम्मे है और उनके पास हथियार बड़े पैमाने पर थे तथा वे हर तरह के प्रशिक्षण से लैस हैं।

हालांकि, इसकी भनक हमारे खुफिया तंत्र को थी। हफ्तेभर पहले दिल्ली के एक अखबार में खबर छपी थी कि अलकायदा के निशाने पर भारत है। उसमें कहा गया था कि अलकायदा किसी भी क्षण ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर सकता है। ज्यादा संभावना है कि ये आतंकवादी पाकिस्तान के कबाइली क्षेत्र के हों और वहां दबाव बढ़ने पर संभव है कि उन्होंने भारत को आसान निशाने के तौर पर चुना। यही नहीं हमारे खुफिया तंत्र ने यह भी कहा था कि मुंबई निशाने पर है। पिछले दिनों दिल्ली में बम धमाकों के दौरान इंडियन मुजाहिदीन का जो ईमेल इंडिया में पहुंचा था, उसमें भ्ीा स्पष्ट था कि अगला निशाना मुंबई या देश का कोई बड़ा शहर हो सकता है। यानी खुफिया सूचनाओं के बावजूद हमारे यहां कोई सावधानी नहीं बरती गई।

यही वजह है कि आतंकवादियों का दुस्साहस इस कदर बढ़ता जा रहा है। असल में हमारे राजनैतिक नेतृत्व में आतंकवाद से लड़ने की कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखती है। आतंकवादियों को पता है कि यहां आसान शरणस्थली मिल सकती है, सजा से बचा जा सकता है, जैसा कि अफजल गुरु का मामला लंबे समय से लटका पड़ा है। नेतृत्व की शिथिलता, कमजोरी, संकल्प की कमी का नुकसान देशवासियों और बेकसूर लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

असल में समूचे राजनैतिक वर्ग की आतंकवाद को लेकर नीतियां ही स्पष्ट नहीं हैं। आतंकवाद पर उसकी वार्षिक रिपोर्ट में भी चार बिंदू पूरी तरह से स्पष्ट हैं। यानी आतंकवाद को लेकर वे किसी संकोच या हिचक में नहीं पड़ते। हमारे यहां कोई भी उपाय आगे नहीं बढ़ता। मसलन, आतंकवाद के लिए संघीय एजेंसी बनाने का विचार अमल में नहीं लाया जा सका। हमारे गृहमंत्री कहते हैं कि राज्य सरकारें सहमत नहीं हैं। उनमें किसी तरह की इच्छाशक्ति ही नहीं है और बिना स्पष्ट नीति और इच्छाशक्ति के आतंकवादी हमले बढ़ते जाएंगे और हम हाथ पर हाथ धरे देखते रहेंगे।
-लेखक उत्तरप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक हैं।





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