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संपादकीय. देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई मे बुधवार रात को हुए आतंकी हमले को भारत का 9/11 (न्यूयॉर्क में 11 सितंबर 2001 को ट्विन टॉवर्स पर अपहृत विमानों से आतंकी हमला) और दुनिया भर में 9/11 के बाद दूसरा सबसे बड़ा हमला बताया जा रहा है। तरीके, दुस्साहस और प्रभाव के लिहाज से रौंगटे खड़े कर देने वाले इस हमले ने समूचे भारत देश की सामूहिक जिजीविषा, धैर्य और साहस के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है।
इस वक्त सोचना यह चाहिए कि एक नागरिक होने के नाते हम क्या कर सकते हैं। सबसे पहले यह समय धर्य और एकजुटता बनाए रखने का है। इस किस्म की चुनौती सामने आने पर जब भी हमने धैर्य खोया है (कंधार विमान अपहरण के दौरान किसी हद तक शायद ऐसा हुआ था) तब-तब शत्रुओं के मंसूबों को कमोबेश पूरा होने का अवसर दिया है। दुश्मन एक बार फिर हमारी परीक्षा ले रहे हैं, वे फिर देश की छाती छलनी कर रहे हैं। वे चाहते ही यह हैं कि हम टूटें, बिखरें, बिफरंे और फिर अराजकता के घोड़े पर सवार होकर खुद को उसके पैरों तले रौंदे जाने का मौका दें। उसका यह नापाक मकसद किसी से छिपा नहीं है। वह जघन्य हमले से इसी मकसद को कामयाब होता देखना चाहता है, लेकिन वह भारतीय जनमानस के हौसले को नहीं जानता।
एक अरब से ज्यादा की आबादी वाले कई धर्मो, जातियों, वर्गो की विविधता से सुशोभित इस देश की एक बड़ी खासियत है संकट के समय उसकी गजब की एकता। चाहे वह 1971 का युद्ध हो या कारगिल की लड़ाई, हम सबने अपने मतभेद भुलाकर दुश्मनों को करारा जवाब दिया है और अंतत: विजयी हुए हैं। इस बार लड़ाई इसलिए उतनी सीधी और आसान नहीं है, क्योंकि दुश्मन का चेहरा स्पष्ट नहीं है और वह सामने से हमला नहीं करता है।
वह पीछे से भितरघात करता है, वह कहीं भी और कहीं से भी हमला कर सकता है। उसके हथियार भी ऐसे हैं जिनका पता हमला होने के बाद ही चलता है। इसका एक ही जवाब है एकता, धर्य व साहस के साथ डटे रहना। वर्षो पहले पंजाब में बाहरी धरती से संचालित आतंकवाद के खिलाफ हम ऐसा ही कर चुके हैं। हार न मानने की जिद और सामाजिक एकता के जज्बे ने तब आतंकियों के मंसूबों को ध्वस्त कर दिया था।
सामाजिक एकता के उसी जज्बे को जुनून में बदलकर इस समय भी आतंकियों के इरादों को परास्त करना है। सुरक्षा बल आगे रहकर मुकाबला कर रहे हैं और उनकी अग्रपंक्तियों से कुछ मूल्यवान जानें हमने गंवाई हैं, जिनके प्रति देश हमेशा ऋणी रहेगा। अगर सरकार के स्तर पर कमियां हैं तो लोकतंत्र में उन्हें ठीक करने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। इस हमले के बाद पूरे साहस और धैर्य से हमें ही अपनी सरकारों को बाध्य करना होगा कि कम से कम अब वे ऐसी अचूक रणनीति बनाएं और उस पर अमल करें जिससे दुश्मन अगली बार ऐसा हमला करने का दुस्साहस न कर पाए। आतंक के खिलाफ लड़ाई का यह भी अहम हिस्सा है और सभी स्तरों पर हम लड़ेंगे तो जरूर जीतेंगे।