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दृष्टिकोण. आतंकवाद अब देश का पीछा कर रहा है। जिस किसी ने भी 26 नवंबर की रात को टीवी स्क्रीन पर मुंबई में हुए आतंकी हमले को देखा होगा, उसे यह अतीत में हुए आंतकी हमलों जैसा ही लगा होगा। यद्यपि ये हमले अलग थे।
भारत ने इस तरह का आतंकी हमला नहीं देखा जहां आतंकवादियों ने होटलों को दहला दिया, लोगों को बंधक बनाया, दूसरों को मारा और अब तक किसी फिरौती की मांग नहीं की। साफ है कि वे अपनी और अपनी मांगों की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। टीवी चैनलों पर हमारी बदहवासी भरी और सत्ताधीशों की भ्रमित करने वाली प्रतिक्रिया ने इसका और प्रचार कर दिया।
टीवी में आतंकी हमलों के दृश्यों को देखने वाले लोगों ने इस बात को नोटिस किया होगा कि आतंकवादी बिलकुल शांत और शारीरिक रूप से फिट नजर आ रहे थे और यहां तक उन्होंने अपने चेहरे ढंकने तक की जहमत नहीं उठाई। उनका आचरण प्रशिक्षित लोगों की तरह था, जो अपने आस-पास के माहौल से परिचित थे और उन्होंने बिलकुल कमांडो की तरह अपनी हरकतों को अंजाम दिया। खेल बिलकुल सीधा है- यह संकट जितना लंबा खिंचता है, उतना ही ज्यादा दूसरों का ध्यान इस पर जाएगा और सरकार पर कुछ करने के लिए उतना ही ज्यादा दबाव पड़ेगा। इस संकट से पार पाने के लिए परम कौशल और प्रतिबद्धता की जरूरत होगी, ताकि जनहानि को जितना संभव हो, कम किया जा सके।
आतंकवादियों की यह टोली परंपरागत फिदायीन दस्ते की तरह नहीं है जो खुद को धमाकों में उड़ाने के लिए तैयार रहती है। फिर भी उनके नौकाओं के जरिए आने और शारीरिक हरकतों से मार्च 1993 में मुंबई में हुए धमाके याद आ जाते हैं। उस समय भी सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद अन्य चुनिंदा लक्ष्यों पर लोगों को मारना उनकी साजिश का एक हिस्सा था। ऑपरेशन का इलाका और लक्ष्य भी एक जैसे ही थे- उच्च वर्ग और संपन्न तबका। क्या इसमें किसी पाकिस्तानी-आईएसआई-दाऊद का हाथ है? अभी यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन ऐसे सवालों से इनकार नहीं किया जा सकता।
ऐसी घटनाओं के बाद देश में यही प्रवृत्ति देखी जाती है कि कुछ सतही परिवर्तन व घोषणाएं तथा कार्रवाई की निंदा कर दी जाती है, घटना के भयावह चित्र जारी होते हैं और मीडिया में कुछ विशेषज्ञों की टिप्पणियां होती हैं। हमारे पास ब्रिटिशों और अमेरिकियों की तरह ऐसे खतरों से निपटने के लिए समुचित कानून तक नहीं हैं और ऐसे देश में, जिसने अपनी आजादी के बाद सबसे ज्यादा आतंकी हमले झेले हैं, हमारे पास राष्ट्रीय पहचान पत्र तक नहीं हैं क्योंकि यह राजनीतिक तौर पर समीचीन नहीं है। हमारा सीमाओं पर नियंत्रण अभी भी नाकाफी है। ऐसी घटनाओं के बाद जांच एजेंसियों को ऐसे इलाकों और समुदायों के बीच अपनी गतिविधि चलाने की छूट होनी चाहिए जहां यह घटना घटी हो या इसकी साजिश रचे जाने का संदेह हो। यदि धर्म और क्षेत्रीयता के आधार पर ही इसका निष्पादन किया जाता रहा, तो हमें ज्यादा सफलता नहीं मिल सकती।
आतंकी वारदातों को लेकर जनता की उदासीनता से भले यह लगे कि लोगों ने इसके भय से पार पा लिया है जो अच्छी बात है, लेकिन यदि यह उदासीनता इस उम्मीद की वजह से है कि ‘मैं’ इसका निशाना इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि ऐसी त्रासदियां सिर्फ ‘दूसरों’ के लिए हैं, तो फिर जरूर समस्या है। ऐसे मामलों में जनता की ओर से समुचित प्रतिक्रिया नहीं मिलती क्योंकि आमतौर पर यह माना जाता है कि आतंकवाद से निपटना सरकार का काम है। इस रवैये को बदलना होगा और सरकार ही इस बदलाव में मददगार हो सकती है।
नागरिकों को इस बात के लिए प्रोत्साहित और शिक्षित किया जाना चाहिए कि ऐसी घटनाओं के संदर्भ में सुराग, पूर्व सूचना देकर और जांच-पड़ताल में सहयोग कर वे सरकार की काफी मदद कर सकते हैं। हमें इस बात को मानना होगा कि ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए हमारा पुलिस बल तैयार नहीं है, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार वह नहीं है। पुलिसकर्मी न तो अच्छी तरह से प्रशिक्षित हैं और न ही उनके पास आधुनिक हथियार हैं।
थानों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण कई बार तो पुलिसकर्मियों को उन्हीं लोगों के रहमोकरम पर रहना पड़ता है, जिनसे समाज को बचाने की उन पर जिम्मेदारी होती है। इन हालात के लिए सरकार ही जिम्मेदार है। अदल-बदल कर आने वाली सरकारों ने पुलिस के प्रभाव और सम्मान को घटाने का ही काम किया है। अपराधियों के खिलाफ गवाही देने वालों की सुरक्षा की व्यवस्था में कई खामियां हैं और न्याय मिलने की समय सीमा भी तय नहीं है।
किसी भी आतंकी हमले के बाद खुफिया एजेंसियों को नाकारा करार देने की होड़ शुरू हो जाती है। ध्यान देने लायक बात यह है कि शांति के समय में जब पुलिस और खुफिया एजेंसियों की खामियों को दूर कर उन्हें सशक्त किया जाना चाहिए, तब कोई ध्यान नहीं दिया जाता। यह सोचकर कि अब कोई खतरा नहीं है, खाली पदों को नहीं भरा जाता, नए और अति-आवश्यक हथियारों की खरीद नहीं होती और आधुनिकीकरण पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। लेकिन कोई भी बड़ी घटना होने के बाद राजनेताओं की अकर्मण्यता पर पर्दा डालने के लिए पुलिस और खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली को जमकर कोसा जाता है। आतंकवाद का सख्ती से मुकाबला करने का सबसे बढ़िया और एकमात्र तरीका खुफिया एजेंसियों को हर स्तर पर सशक्त करना है।
आतंकी हमले मीडिया के लिए ‘ब्रेकिंग न्यूज’ जरूर बनते हैं, लेकिन उसे भी इसका कवरेज करते समय एहतियात बरतनी चाहिए। सच्चई को सभी के सामने लाना जरूरी है, लेकिन कई बार मीडिया की कवरेज आतंकवादियों को फायदा पहुंचाती है।
टीवी चैनलों पर बार-बार घबराए हुए बच्चों, डरे हुए परिवारों के चेहरे और क्षत-विक्षत शवों को दिखाए जाने पर पूरे देश में भय का माहौल फैलता है जिससे आतंकवादियों के उद्देश्य की ही पूर्ति होती है। इसी तरह हमलों के चश्मदीद गवाहों के चेहरे दिखाना भी सही नहीं है। जाने-अनजाने आतंकवादियों को फिदायीन करार देकर भी हम उन्हें हाइलाइट ही करते हैं। आतंकवाद के खिलाफ जंग जीतने के लिए हमें यह सब बदलना होगा। स्वयं को सुररिक्षत रखने के लिए भारत को हर हाल में आतंकवादियों का समय रहते पता लगाकर उन्हें नेस्तोनाबूद करना ही होगा।
-लेखक ‘रॉ’ के पूर्व प्रमुख और नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े हैं।