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सुबह पाठशाला, शाम को मधुशाला

दंतेवाड़ा. राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाइएज्ज ‘पाठशाला’ और ‘मधुशाला’। जी हां, सुप्रसिद्ध कवि हरिवंशराय बच्चन ने ये पंक्तियां उनके लिए लिखी थीं, जो मधुशाला की खोज में घर से निकलते हैं। इस कहानी में थोड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है छिंदनार के आगे मुस्तलनार और खालेपारा में। यहां एस्बेस्टस शीट के नीचे लगने वाली प्राथमिक शाला में दिन में विद्यार्थी बैठकर पढ़ते हैं और उनके जाते ही यहां शराब बनाने का काम शुरू हो जाता है।

स्कूल भवन में आश्रम
दो साल पहले तक जिस भवन में मुस्तलनार की प्राथमिक शाला लज्‍जती थी, अब उसे 50 सीटर बालक-बालिका आश्रम में तब्दील कर दिया गया है। नतीजतन स्कूल के बच्चे अब सीमेंट शीट से बने शेड के नीचे बैठकर पढ़ते हैं। यहां पदस्थ सहायक शिक्षक पीआर चापड़ी की डच्यूटी चुनाव कार्य में लगती है और उच्च श्रेणी शिक्षक डीएल कावड़े अकेले बच्चों को शिक्षित-दीक्षित कर रहे हैं। कावड़े कहते हैं कि स्टॉफ और भवन के अभाव में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

मुस्तलनार से लगे खालेपारा के प्रायमरी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 22 के करीब है। सभी शेड के नीचे बैठकर पढ़ने मजबूर हैं। बताया गया है कि 4 साल पहले यहां के लिए भवन निर्माण हेतु स्वीकृति मिल गई थी। निर्माण प्रारंभ भी हो चुका था पर किन्हीं कारणों से इसे अधूरा छोड़ दिया गया है। हालत यह है कि निर्माण पूरा होने से पहले ही भवन खंडहर में तब्दील होता जा रहा है।

दोपहर बाद मधुशाला
दोपहर 3 बजे तक यहां बज्चे पढ़ाई करते हैं। इसके बाद इसी शेड के नीचे देशी शराब बनाने का काम शुरू हो जाता है। यहां के लोग इस शेड का उपयोग शराब बनाने के लिए करते हैं। यहां पदस्थ शिक्षक रामसाय भास्कर कहते हैं कि कुछ न कह पाने की मजबूरी इसलिए है, क्योंकि यह शेड भी स्कूल प्रबंधन का नहीं।

उस इलाके में हमारे एक भी स्कूल नहीं हैं। जितने भी स्कूल हैं, सभी ट्राइबल विभाग संचालित करता है। इस लिहाज से सहायक आयुक्त को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
-एचआर शर्मा, जिला शिक्षा अधिकारी, दंतेवाड़ा





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