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मुंबई पर नहीं, भारत पर हुआ यह हमला

vedहमला मुंबई पर नहीं, भारत पर है। भारत पर हजार साल से हो रहे हमलों की काली किताब का यह एक नया अध्याय है। न्यूयॉर्क के ट्रेड टॉवर पर आसमान से हमला हुआ था, मुंबई पर समुद्र से हुआ है। आसमानी हमले के मुकाबले यह सामुद्रिक हमला अधिक योजनाबद्ध और अधिक दुस्साहसिक है। जाहिर है कि यह जाल हैदराबाद या दिल्ली या मुंबई का बुना हुआ नहीं है। इसके तार कोलंबो, कराची और काबुल से जु़ड़े होने की पूरी संभावनाएं हैं।

एक साथ दर्जन भर ठिकानों पर तब तक हल्ला नहीं बोला जा सकता, जब तक कि हमलावरों के सिर पर तजुर्बेकार षड्यंत्रकारियों का हाथ न हो, महीनों लंबी तैयारी न हो, बार-बार का पूर्वाभ्यास न हो, लाखों-करोड़ों के खर्च का इंतजाम न हो। इतना ही नहीं, भारत राज्य के एक अरब नागरिकों में से किसी को उसका सुराग भी न हो। यह असंभव नहीं कि यह साजिश भारत के बाहर किसी विदेशी कोख में पलती रही हो। यदि यह साजिश भारत में रची गई होती तो इसमें न तो इतने ज्यादा खलनायक होते और न ही एक साथ इतने ठिकाने चुने जाते।

अमेरिकन और ब्रिटिश विश्लेषकों की राय है कि आतंकवादियों ने ताज और ओबेरॉय जैसे ठिकाने इसीलिए चुने कि उन्हें ट्रेड टॉवर के अधूरे अध्याय को पूरा करना था। इन पांच सितारा होटलों में रहने वाले अमेरिकी और ब्रिटिश नागरिकों को उन्होंने अपना निशाना बनाकर यह बता दिया कि वे शेर को उसकी मांद में घुसकर नहीं मार सकते तो उसे अब वे उसकी सैरगाह में मारेंगे।

मुंबई के यहूदी परिवार पर हुए हमले ने पश्चिमी समाज की उक्त धारणा को अधिक बद्धमूल किया है। अमेरिका जैसे देशों ने अपने यहां आतंकवाद की जड़ें उखाड़ दी हैं, लेकिन ये जड़ें भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे पिलपिले देशों में लहलहा रही हैं। भारत पर हुए हमले को अमेरिका यदि खुद पर हुआ हमला मान रहा है तो यह उसकी अपनी सोच है।

भारत की सोच कुछ अलग है। इस तरह के हमलों को काश, वह भारत पर हुआ हमला मानता! कंधार-कांड हो, संसद हो, अक्षरधाम हो, दिल्ली हो, मालेगांव हो - वह इन हमलों को सिर्फ उन पर हुआ मानता है, जो मरे हों या घायल हुए हों। हताहतों को मुआवजा, शोक-संवेदनाओं के बयान, चैनलों पर थोड़ी-बहुत सनसनी, अखबारों में संपादकीय और फिर चक्का सड़क पर जस का तस चलने लगता है। भारत की जनता कितनी धैर्यशाली है, कितनी सहनशील है, कितनी दूरंदेश है, कितनी बहादुर है आदि वाक्यावलियों का अंबार लग जाता है। नेता एक-दूसरे को कोसते हैं। आतंकवादियों को लेकर राजनीति करते हैं। उस पर मजहब का रंग चढ़ाते हैं, लेकिन दावा करते हैं कि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता।

हमारा गुंडा, गुंडा नहीं साधु है और तुम्हारा साधु, साधु नहीं गुंडा है - यह सिद्धांत नेताओं से फिसलता हुआ आम जनता की जुबान पर चढ़ जाता है। यही भारत का अ-भारत होना है। राष्ट्र का विफल होना है। भारत-भाव का भंग होना है। किसी मुद्दे पर फैसला करते समय जब लोग उसके शुभ-अशुभ, उचित-अनुचित और नैतिक-अनैतिक होने का ध्यान न करें और उसे मजहब, जात या वोट के चश्मे से देखें तो मान लीजिए कि भारत भारत न रहा, धृतराष्ट्र हो गया। उसकी जवानी और आंखें, दोनों चली गई। क्या बूढ़ा और अंधा भारत जवान और गुमराह आतंकवादियों का मुकाबला कर पाएगा?

आतंक का जवाब आतंक ही है। गुमराहों के आतंक के मुकाबले राज्य का आतंक! कांटे को कांटे से ही निकाला जा सकता है। जैसे आतंकवादी किसी कानून-कायदे और नफे-नुकसान की परवाह नहीं करते, ठीक वैसे ही राज्य को उनके प्रति घोर निर्मम और नृशंस होना होगा। यदि उनकी जड़ बाहर है तो भारत को अपनी खोल से बाहर निकलना होगा। उन जड़ों को मट्ठा पिलाना होगा। वह महाशक्ति भी क्या महाशक्ति है, जो अपनी बगल में भिनभिना रहे मच्छरों को भी न मार सके ? भारत रौद्र रूप तो धारण करे। आतंक के अड्डे अपने आप बिखर जाएंगे।

आतंकवादियों को जिस दिन समझ में आ गया कि उनके माता-पिता, भाई-बहनों, रिश्तेदारों, दोस्तों और सहकर्मियों को भी उनके कुकर्म की चक्की में पिसना होगा, कोई भी कदम उठाने के पहले उनकी हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाएगी। सारा समाज भी चौकन्ना हो जाएगा। हमारी लंगड़ी गुप्तचर सेवा अपने आप मजबूत हो जाएगी। साधारण लोग सूचना के असाधारण स्रोत बन जाएंगे। उन्हें पहले से पता होगा कि सूचना नहीं देना या चौकन्ना नहीं रहना भी अपराध ही माना जाएगा। यदि हमें राज्य को विफल होने से बचाना है तो समाज को सबल बनाना होगा। आतंकवादियों के ब्लैकमेल के आगे भारत ने कई बार घुटने टेके हैं, क्योंकि हमारा समाज बहादुरी की कीमत चुकाना नहीं जानता। हमारा समाज जिस दिन बहादुरी की कीमत चुकाना सीख लेगा, उसी दिन हमारे मुर्दा नेता भी महाबलियों की तरह पेश आने लगेंगे।
(लेखक वरिष्ठ राजनीतिक चिंतक हैं)





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