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आसान नहीं अंदाज

भोपाल. राज्य के इतिहास में पहली बार 69.31 प्रतिशत मतदान के बावजूद विशेषज्ञ इस आधार पर भावी सरकार के कयास लगाने से बच रहे हैं। उनके मुताबिक मतदाता सूची से निकाले गए बोगस नाम, उम्मीदवारों की बढ़ी संख्या और प्रत्याशियों के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा के कारण बढ़े मतदान के प्रतिशत से भविष्य के सत्ताधारियों का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

दूसरी तरफ, इस बार महिलाओं ने भारी संख्या में मताधिकार का प्रयोग किया है। पिछड़े, आदिवासी इलाकों में वोट का प्रतिशत काफी बढ़ा है। सागर जिले के कुछ मतदान केंद्रों पर सौ प्रतिशत तक वोटिंग कही जा रही है। पहले के अनुभव हैं कि ज्यादा मतदान सरकार के खिलाफ नाराजी को उजागर करता है। क्या इस बार भी ऐसा ही एंटी इंकंबेंसी का मामला तो नहीं है?

बोगस वोटरों के नाम कटे
वोटरों की पहचान में चुनाव आयोग द्वारा बरती गई अतिरिक्त सावधानी के कारण पिछली बार के मुकाबले राज्य के मतदाताओं की संख्या कम हुई है। वर्ष 2003 में करीब तीन करोड़ 79 लाख मतदाता थे, लेकिन 2008 में यह संख्या घटकर तीन करोड़ 59 लाख हो गई। मतदाता कम होंगे तो वोटों का प्रतिशत बढ़ेगा, लेकिन इसके आधार पर किसी भी पार्टी के सत्ता पर काबिज होने के अनुमान नहीं लगाए जा सकते।

टक्कर में बढ़े मतदाता
चुनाव में अंत तक किसी तरह की ‘हवा’, मुद्दों और सर्वमान्य नेतृत्व का अभाव रहा है। ऐसे में हरेक प्रत्याशी ने अधिक से अधिक मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने की कोशिश की है, लेकिन इस तरह से बढ़ा वोट का प्रतिशत किसी तरह के कयास लगा पाने में मदद नहीं कर सकता।

उम्मीदवारों की बढ़ी संख्या
वर्ष-2003 के मुकाबले इस वर्ष प्रत्याशियों की संख्या में करीब एक हजार का इजाफा हुआ है। ज्यादा उम्मीदवार, ज्यादा लोगों से मताधिकार का प्रयोग करवाते हैं। इससे बढ़ा मतदान का प्रतिशत भी नतीजों पर कोई नजर नहीं डाल पाता।

नहीं लगा पा रहे कयास
चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने दस राज्यों के 15 चुनावों के अध्ययन के आधार पर भास्कर को बताया कि किसी विशेष क्षेत्र को छोड़ दें तो मध्यप्रदेश में सिर्फ मतदान के बढ़ने के आधार पर कुछ भी अनुमान लगाना कठिन है। यह राज्य कम मतदान वाले चार राज्यों उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, गुजरात और मध्यप्रदेश में से एक है। वर्ष 1989 से 2003 के बीच हुए चार चुनावों में यहां का औसत मतदान 58.3 प्रतिशत रहा है। इसके पहले मतदान का प्रतिशत 45-50 के बीच रहता था। वर्ष 1993 में पहली बार राज्य में 60.5 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया था।

जातियों, शहरी-ग्रामीण, स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब आदि खानों में बंटे समाज में चुनाव के प्रतिशत के आधार पर कोई अनुमान लगाना कठिन है। अमेरिकी समाज में ऐसा विभाजन नहीं है, इसलिए वहां ज्यादा सही अनुमान लगाए जा सकते हैं।
-प्रो. त्रिलोचन शास्त्री, राष्ट्रीय इलेक्शन वॉच के संयोजक एवं डीन, आईआईएम, बंगलूर





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