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देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर आतंकवादी हमला देशवासियों की अस्मिता पर हमला है और उन्हें खुली चेतावनी है कि भारत में आत्मघाती दस्तों के युग की शुरुआत हो गई है। अभी तक छिपकर बम धमाके करके अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले आतंकवादी अब आमने-सामने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
मुंबई पुलिस ने पांच बेहतरीन अफसरों सहित कुल चौदह पुलिस वालों को खो दिया है। सैकड़ों लोग हताहत हुए हैं, जिनमें कुछ विदेशी भी शामिल हैं। अभी भी कई लोग आतंकवादियों के कब्जे में हैं। मुठभेड़ चल रही है। पांच आतंकवादी मारे गए हैं। कुछ आतंकवादी गिरफ्तार भी हुए हैं।
थल सेना और जल सेना के कमांडो पुलिस के साथ मिलकर आतंकवादियों से जूझ रहे हैं। इंग्लैंड की क्रिकेट टीम ने अपना दौरा रद्द कर दिया है। स्टाक एक्सचेंज बंद और कारोबार ठप्प है। कफ्यरू लगाकर लोगों को घर में ही रहने की हिदायत दी गई है। स्कूल-कालेज बंद हैं। आतंकवादी सेटेलाइट फोन पर देश और विदेश में बात कर रहे हैं। आतंकवादियों ने अपनी मांग सामने रख दी है। हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल है कि क्या हमने आतंकवाद के सामने घुटने टेक दिए हैं? यह विचारणीय है कि आतंकवाद के विरुद्ध हमारी लड़ाई कितनी दमदार है।
आतंकवाद से लड़ने के लिए चार हथियारों की जरूरत होती है- सशक्त कानून, मुस्तैद खुफिया-तंत्र, प्रशिक्षित और उत्साही विशेष पुलिस दस्ता तथा त्वरित न्याय प्रक्रिया। विश्लेषण का विषय है कि हमारे पास इनमें से कौन-कौन से हथियार उपलब्ध हैं? उत्तर हम सभी जानते हैं परंतु मानने को तैयार नहीं होते। सामान्य कानूनों के सहारे आतंकवाद की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।
‘टाडा’ और ‘पोटा’ जैसे कानूनों को हमने ‘काले कानून’ की संज्ञा देकर कानून की किताबों से हटाया था। यह दलील दी गई थी कि इन कानूनों का दुरुपयोग हुआ है। किसी भी कानून के दुरुपयोग की संभावनाएं सदैव होती हैं। कानूनों का दुरुपयोग हमेशा होता रहा है और आगे भी होगा, परंतु दुरुपयोग के डर से कानून का अस्तित्व ही मिटा देना समझदारी नहीं है। आंतरिक सुरक्षा की जरूरतों पर राजनीति हावी हो गई है और अब आतंकवाद राजनीति पर भारी पड़ रहा है। आंतरिक सुरक्षा पर राजनीति की देश ने बड़ी भारी कीमत चुकाई है। देश के इतिहास में सबसे बड़े आतंकी हमले में जान-माल की हानि और प्रतिष्ठा की नीलामी हो जाने के बाद हर कोई कठोर से कठोर आतंकवाद निरोधी कानून की वकालत कर रहा है।
जब भी कोई आतंकी हमला होता है, खुफिया-तंत्र की विफलता के सिर ठीकरा फोड़ दिया जाता है। खुफिया-तंत्र की मजबूरियां आम आदमी नहीं जानता। खुफिया-तंत्र के पुनर्गठन के बारे में बहुत कुछ सोच-विचार करने की आवश्यकता है। कुछ टेलीफोनों पर इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के बलबूते पर खुफिया-तंत्र राजनैतिक सूचना इकट्ठा कर सकता है, आंतरिक सुरक्षा से संबंधित जानकारी नहीं। सक्षम खुफिया तंत्र के लिए जरूरी है कि जासूस चप्पे-चप्पे पर भौगोलिक निगरानी रखें।
इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के तौर-तरीकों को संपूर्ण बनाने की दिशा में बहुत कुछ करना बाकी है। खुफिया-तंत्र का कैडर अंगुलियों पर गिना जा सकता है। आतंकवादियों से संबंधित सूचनाएं एकत्र करने के लिए व्यापक स्तर पर विशेष कार्य-बल स्थापित करने की जरूरत है। खुफिया-तंत्र को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता। नागरिकों के सहयोग के बिना कोई भी खुफिया तंत्र सफल नहीं हो सकता। यदि प्रत्येक नागरिक अपने घर के आस-पास केवल दो घरों पर निगरानी रख सके तो कोई आतंकवादी छिप नहीं सकता। आम आदमी को भी इस राष्ट्रीय-दायित्व के प्रति सचेत करने की आवश्यकता है।
आतंकवाद से निपटना सामान्य पुलिस के बूते से बाहर है। प्रत्येक राज्य में विशेष प्रशिक्षित आतंकवाद निरोधी पुलिस दस्ते गठित किए जाने चाहिए। इन विशेष दस्तों को प्रशिक्षण के साथ-साथ विशेष कानूनी संरक्षण की भी दरकार है ताकि इन्हें आतंकवाद से लड़ने वाली पंजाब पुलिस जैसी फजीहत और दुर्गति से बचाया जा सके। आतंकवाद से संबंधित मामलों का त्वरित निपटान करना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। देश की संसद पर हमला करने वाला आतंकवादी अभी भी न्याय-व्यवस्था का मजाक उड़ा रहा है। इस पर विचार होना चाहिए कि जिस आतंकवादी को अपनी जान की परवाह नहीं, उसकी जान की रक्षा की कितनी जिम्मेदारी व्यवस्था की होनी चाहिए।
आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई लड़ने के गुर हमें अमेरिका और ब्रिटेन से भी सीखने की जरूरत है। ब्रिटेन और अमेरिका हमसे बड़े लोकतंत्रवादी और मानवतावादी देश हैं। आतंकवादियों के मानवाधिकारों और आतंकवाद के परिप्रेक्ष्य में प्रेस की आजादी से संबंधित मसलों पर हमें इन देशों से बहुत कुछ सीखना बाकी है। धू-धू जलता ताज होटल हमारी बेबसी की कहानी बयान कर रहा है। एक ‘नरम राज्य’ की छवि के साथ आतंकवाद का सफाया करना निरा स्वप्न है। आतंकवाद एक विशेष समस्या है जिसके समाधान के लिए विशेष प्रावधान करना बेहद जरूरी है। आतंकवाद से लड़ने के लिए ‘पोटा’ से भी कठोर कानून की जरूरत है।
-लेखक वर्तमान में हरियाणा के पुलिस महानिरीक्षक हैं।