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मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करके भारतीय राजनीति में एक धूमकेतु की तरह उदित हुए भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह उर्फ राजा मांडा नहीं रहे। राजनीतिक विरोधाभासों के प्रतीक वीपी एक संवेदनशील कलाकार भी थे और पिछले कुछ वर्षो से कविता और चित्रकारी के क्षेत्र में सक्रिय थे।
वीपी सिंह की राजनीति से बहुतेरे लोगों को उनके समय में भी असहमति थी और बाद में भी रही, लेकिन वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा देकर जब वे तत्कालीन राजनीति के केंद्र में आए, तो मिस्टर क्लीन की छवि भी धूमिल हो गई और आखिरकार उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी। तत्कालीन केंद्र सरकार में वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने उद्योगपतियों के खिलाफ करवंचना के मामले में कार्रवाई शुरू की। प्रारंभ में तत्कालीन प्रधानमंत्री के खासमखास और विश्वासपात्र होने के बावजूद धीरे-धीरे उनकी दूरी इतनी बढ़ गई कि उन्होंने लगभग शहादत की मुद्रा में सरकार से इस्तीफा दे दिया।
भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान करके उन्होंने बता दिया कि उनके लिए देशहित से ज्यादा महत्वपूर्ण पद नहीं है। उत्तर प्रदेश में अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अपनी ईमानदार और न्यायप्रिय छवि के कारण जाने जाते थे, लेकिन अस्सी के दशक में डकैतों ने जब उनके भाई की हत्या कर दी, तो इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया था। भारतीय राजनीति में दक्षिण और वाम ध्रुवों को प्रकारांतर से एक साथ लाने का जो करिश्मा वीपी सिंह ने किया, वह न तो उनसे पहले किसी ने किया और ने उसके बाद कोई कर सका। तीसरे मोर्चे की विजय के बाद प्रधानमंत्री के रूप में वीपी सिंह का चयन बेहद नाटकीय तरीके से हुआ और शायद उनकी सरकार की नाकामी की यह भी एक वजह बनी। कई विवादास्पद मामलों को लेकर उनकी बेहद आलोचना हुई और सरकार में उनके सहयोगी दलों ने भी उन्हें कई बार बेहद मुश्किल स्थितियों में डाला।
मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद उनके खिलाफ देश भर में उग्र विरोध प्रदर्शन हुए और उसके समानांतर सांप्रदायिक राजनीति परवान चढ़ी। रामशिला पूजन के लिए निकली आडवाणी की रथ यात्रा को बीच में रोककर जब उनके दल के तत्कालीन नेता लालू प्रसाद यादव ने बिहार के समस्तीपुर में उन्हें गिरफ्तार किया, तो बाहर से समर्थन दे रही भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया और उनकी सरकार गिर गई।
मगर मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके भारतीय राजनीति में उन्होंने सामाजिक न्याय की अवधारणा को न केवल केंद्र में ला दिया, बल्कि काफी हद स्थापित करने में उनकी महती भूमिका से शायद बहुत कम लोगों की असहमति होगी। बेहद खराब स्वास्थ्य के बावजूद पिछले कुछ समय से विदर्भ के किसानों और हाशिए के लोगों के जीवन-संघर्ष की यात्रा में निरंतर शरीक होने वाले वीपी सिंह एक अनंत यात्रा पर निकल गए।