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जगाएं आतंक से लड़ने का जज्बा

दृष्टिकोण. किसी शहर या खासकर किसी होटल या इमारत में आतंकवादी घुस आएं, तो यह बात तय है कि ये दहशतगर्द गुरिल्ला युद्ध में पारंगत हैं। ऐसे में उनका मुकाबला मात्र परंपरागत तरीकों से नहीं किया जा सकता।

एक सिपाही होने के नाते मुझे लगता है कि होटल ताज, होटल ट्राइडेंट (ओबेरॉय) और नरीमन हाउस जैसी बहुमंजिली इमारतों में छिपे बैठे आतंकवादियों से लड़ने के लिए सबसे पहले आतंकवादियों के इस्तेमाल में लाए जाने वाले रास्तों को तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए था। यह करना पुलिस के लिए आसान भी है और यही परंपरागत तरीका भी है। इसका इस्तेमाल तुरंत करने से यह फायदा होता है कि आतंकवादियों की गतिविधियों को काफी हद तक सीमित किया सकता है। इसके बाद ऐसी योजना तैयार करने की बारी आती है, जिससे आतंकवादियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई शुरू की जा सके।

पिछले कई घंटों से मुंबई की इमारतों में चल रहे ऑपरेशन को देखने के दौरान यह महसूस हो रहा है कि सामान्य सोच के साथ प्लान पर अमल नहीं हो पा रहा है। हेलीकॉप्टर से कमांडो को उतारा गया। इससे एक कंमाडो घायल हो गया और वहां अफरा-तफरी का माहौल बन गया, जो किसी भी ऑपरेशन के लिए ठीक नहीं है। ऐसे में हमें ज्यादा से ज्यादा उसी कार्रवाई को आगे बढ़ाना चाहिए, जिसमें हमारे जवान अच्छी तरह से पारंगत हैं। तीनों इमारतों में जहां आतंकवादियों ने लोगों को बंधक बना रखा था, वहां सभी प्रकार की सप्लाई लाइन काटने के साथ ही आगे बढ़ने की दूसरी रणनीति पर भी काम करना चाहिए था। इन इमारतों में सामान्य रास्तों के अलावा दूसरे रास्तों का इस्तेमाल भी पुलिस बखूबी कर सकती थी। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करके माहौल बनाने की कोशिश की जाए।

किसी भी तरह के आतंकवादी हमले में अधिकारी को अपने आप को बचाते हुए सामने से आपरेशन लीड करना होता है। मुंबई में हुए आतंकी हमले में यह गलती पुलिस की ओर से हुई है। अधिकारियों के मारे जाने के बाद पुलिस का मनोबल गिर जाता है। ऐसे में एक अधिकारी के तौर पर अपने आप को बचाना भी बहुत ही बड़ी रणनीति होती है। अधिकारी एक होता है और जवान सैकड़ों, ऐसे में प्लानिंग की भूमिका बेहद अहम है। इन हालात में यह प्लानिंग जरूरी है कि इमारत के जिस हिस्से पर पुलिस का कब्जा होता जाए, उस हिस्से को पूरी तरह से सील कर दिया जाए, ताकि आतंकवादी उसका फिर से इस्तेमाल नहीं कर सकें।

अभी तक जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार इन इमारतों में घुसे आतंकवादियों की संख्या ज्यादा नहीं है, लेकिन तीनों इमारतों में उनकी आवा-जाही जबरदस्त तरीके से चल रही है। इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाना जरूरी होता है। जब तक उनकी हलचलें कम नहीं होगीं, पुलिस का ध्यान बंटता रहेगा और लड़ाई लंबी खिंचती जाएगी, जिससे आखिरकार आतंकवादियों के मंसूबे पूरे होते। आतंकवादियों की हलचल को कम करने के लिए यह जरूरी है कि जहां तक संभव हो, कांबिंग ऑपरेशन चलाकर उन्हें एक जगह तक सीमित कर दिया जाए। ऐसा करके ही ऑपरेशन जल्द से जल्द खत्म हो सकता है।

मुंबई में आतंकवादियों के खिलाफ चल रही लड़ाई में पुलिस ने कुछ बेहतर प्रयोग भी किए हैं, जो काफी हद तक सफल भी रहे। ऐसा न होता तो इस घटना में और भी लोगों की जान जा सकती थी। बड़े पुलिस अधिकारियों के मारे जाने के बावजूद पुलिस डटी रही, अन्यथा आतंकवादी और सुरक्षित जगह पर पहुंच सकते थे। इसके अलावा आतंकवादियों से बातचीत नहीं करना भी अच्छा रहा है। इससे देश और दुनिया में यह संदेश जाता है कि सरकार आतंकवादियों से कोई बात नहीं करेगी।

दरअसल पाकिस्तान के मैरिएट होटल में आतंकवादी हमला होने के बाद ही मुंबई पुलिस को इस बात का अंदाजा लगा लेना चाहिए था कि उनके शहर के होटलों पर भी इस तरह के हमले हो सकते हैं। इसके लिए किसी गुप्त सूचना का इंतजार करने वाली कोई बात ही नहीं थी। होटलों के सुरक्षा इंतजामों की उसी वक्त समीक्षा करने के साथ ही उन्हें पुख्ता करने के इंतजाम करने चाहिए थे। अगर उस वक्त यह हुआ होता, तो ऐसी नौबत नहीं आती। इसे मैं पुलिस अधिकारियों की अंदाजा लगाने में असफलता ही मानता हूं क्योंकि मैरिएट होटल पर हुए आतंकी हमले से भारत में भी इस तरह के हमले के संकेत मिल चुके थे।

मुंबई में तीन-चार बड़े आतंकी हमले हो चुके हैं। इसके बावजूद इस हमले के बाद मुंबई पुलिस में अफरा-तफरी से यह साफ है कि मुंबई पुलिस इसके लिए तैयार ही नहीं थी। तैयारी नहीं होने के कारण ही अनेक अधिकारियों की जानें गई हैं। मुंबई के लिए इस तरह की चूक बहुत ही खतरनाक है क्योंकि यह शहर एक किनारे में है और सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अगर इस महत्व को समझा जाता, तो इस तरह की घटनाओं में हमारा ज्यादा नुकसान नहीं होता।

इस तरह के आतंकी हमलों से निपटने के लिए पहले तो आतंकवाद प्रभावित शहरों के हरेक थानों में एटीएस (आतंकवाद निरोधक दस्ता) होना चाहिए, जो आधुनिक हथियार व आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित हों। इसके अलावा हमें यह भी करना होगा कि आतंकवाद जैसे संवेदनशील मसले को राजनीति से दूर रखा जाए। एटीएस में सिफारिशी अधिकारी नहीं, विशेषज्ञ अधिकारियों की तैनाती करें।

इस बात पर भी गौर करना होगा कि सूचना तंत्र केवल इंटेलिजेंस के भरोसे नहीं चल सकता है। बीट पर तैनात सिपाही को भी सूचना तंत्र में शामिल करने की जरूरत है। साथ ही साथ हमें आतंकवादियों से लड़ने का जज्बा हरेक नागरिक में पैदा करना होगा। (संजय मिश्रा से बातचीत पर आधारित
) - लेखक पंजाब के पुलिस महानिदेशक रहे हैं।





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