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सरकार को नहीं, हमें लड़ना होगा

विशेष. मुंबई में रक्तपात हो रहा है। समूचा विश्व सकते में है। हम पथरा गए हैं। क्या कोई है जो आतंक का संहार कर सके? हमारी जिन्दगियां क्या इतने घृणित तरीके से नष्ट होती रहेंगी? आतंक से आखिर कैसे लड़ें? आतंक के विरुद्ध युद्ध लड़ने के चार प्रेरक उदाहरण हैं। दो अतीत के हैं, जबकि दो की यादें ताजा हैं। अतीत की दोनों घटनाएं दूसरे विश्व युद्ध की हैं। दोनों 1941 में घटीं।

लंदन की तबाही : भय, भत्र्सना और धैर्य
नाज़ी नेतृत्व को दुनिया में दमखम से दमनपूर्वक स्थापित करने के अपने सैन्य प्रयासों से हटकर जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने यकायक वायुसेना को ब्रिटेन पर बमबारी करने का आदेश दिया। इसके बाद शुरू हुआ अंतहीन आतंक का सिलसिला। 57 दिनों तक लगातार लंदन पर बम बरसाए गए। कभी रात में तो कभी भरी दोपहरी में। आधुनिक, सभ्य समाज में एक देश की दूसरे देश में आतंक फैलाने की यह पहली घटना मानी जाती है।

ब्रिटेन में भय का वातावरण छा गया। लंदन बर्बाद हो गया। उसने जर्मनी के कुछ हिस्सों पर छोटे-मोटे आक्रमण भी किए। आतंक की भत्र्सना की। दहशत फैलाने को ‘कायरता’ करार दिया। लड़ने का संकल्प लिया। ऐसा तब तक जारी रहा जब तक कि हिटलर ने सेनाओं को रूस की ओर न मोड़ दिया।

पर्ल हार्बर हमला : प्रतिशोध, रणनीति और आक्रमण
अमेरिका के हवाई में पर्ल हार्बर पर अलसुबह जब किसी की आंख खुली थी, कुछ अधखुली थीं- भयावह विस्फोटों से हड़कम्प मच गया। सैकड़ों जापानी युद्धक विमानों ने न सिर्फ कई तरह के बम अमेरिकी युद्धपोतों पर बरसाए बल्कि समीप फैले वायुसेना क्षेत्र को भी तबाह कर दिया। हजारों सैनिक व आम आदमी मारे गए।

राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट ने प्रतिशोध लेने की घोषणा की। किंतु पहले उस सर्वोच्च युद्धपोत को फिर से संवारने की बात की- जो अमेरिकी सैन्य शक्ति का प्रतीक था और पर्ल हार्बर में जापानी हमले में नष्ट कर दिया गया था। मतलब साफ था-पहले उबरना होगा। फिर बदले की तैयारी करनी होगी। तत्काल ढूंढ़कर जापान की ताकत माने जाने वाले ‘शोकाकु और झुइकाकु’ युद्धपोतों को नेस्तनाबूद किया। अपनी सेना को सीख दी कि जोश में होश न खोएं। जापानी सेना में आत्मघाती पायलट दस्ते ‘कमीकाजे’ होते हैं जिन्हें चूंकि मौत तो चाहिए होती है-इसलिए कोई डर नहीं होता।

पूरी फौज झोंक दी-तो विमानों की देखरेख, डिजाइन, गैर-युद्ध कई कार्यो के लिए सैनिक न बचे। कुछ नहीं-चारों ओर लाखों पोस्टर जारी कर दिए-‘महिलाएं अमेरिका की ताकत हैं-आज हमें महिलाओं की जरूरत है, जापानी आतंक देश के युवकों के लिए चुनौती है, हम मात देकर दिखाएंगे’ आदि। इस पर एक करोड़ लोग आगे आए। मिडवे वॉर नाम से प्रसिद्ध युद्ध में जापान को इतनी निर्ममता और बहादुरी से परास्त किया कि फिर उसने गलती से भी अमेरिका की ओर नहीं देखा।

बेसलान के बंधक: कमजोर होने से बदतर कमजोर दिखना
पांच साल पहले रूस के बेसलान इलाके में चेचन आतंकियों ने हजार लोगों, खासकर 700 बच्चों को उनके स्कूल में बंधक बना लिया था। राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन खुद वहां पहुंचे थे-जज्बा जगाने। कमांडो कार्रवाई से छुड़वा लिए बच्चे। लेकिन तब तक 200 जानें जा चुकी थीं। पुतिन ने स्टॉलिन के शब्दों को याद कर कहा था: हम कमजोर थे- लेकिन इससे बदतर था हमारी कमजोरी का दिखना। बाद में उन्होंने इसे अल कायदा से जोड़ा। खूब संकल्प लिए। चेचन्या में आधी-अधूरी लड़ाई भी लड़ी, मगर अंत न हुआ।़

9/11 : बदल दी सारी दुनिया
ऐसी ही घटना 9/11 है। हमारे यहां सरकारी तंत्र को कोसने वालों को आश्चर्य होगा। वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमला कर मर चुके आतंकी मोहम्मद अट्टा का पासपोर्ट 9/11 के कुछ दिनों बाद किसी बाबू ने जारी किया! जबकि अट्टा अपने पैने नैन-नक्श के साथ हर दिन टीवी-अखबारों में प्रमुखता से दिखाया जा रहा था। उसे प्लेन उड़ाना तो आता था, उतारना नहीं। इसलिए उसने उड़ते विमान को 112 मंजिलों की इमारत से टकराकर हजारों की जान ले ली। प्लान तो 200 यात्रियों को बंधक बनाने का ही था। खैर, 9/11 के बाद अमेरिका में पहली बार, ‘होमलैंड सिक्योरिटी’ मंत्रालय बना। असाधारण सख्ती की गई। दो युद्ध लड़े। फिर उन पर कोई हमला नहीं कर सका।

..अभी हम कैसे हैं?
अभी हम 1941 के ब्रिटेन जैसे हैं, भय में जीते हैं। भत्र्सना करते रहते हैं। हम 2004 के रूस बने हुए हैं-बंधकों को रिहा करवाते हैं। कई मासूम जिंदगियों को तबाह होने देते हैं। कभी-कभार आधा-अधूरा हमला भी कर देते हैं।

जबकि हमें पर्ल हार्बर हमले से विचलित प्रतिशोध की आग भीतर जलाए रखते हुए आतंक विरोधी युद्ध लड़ना होगा। मुंबई पर हुए हमले को ‘हमारा-9/11’ कहा जा रहा है-क्या हम कोई ऐसा भारी परिवर्तन कर पाएंगे- जिससे किसी की हिम्मत न हो कि हम पर हमला करने की सोच भी सके। ऐसा करना इसलिए बहुत कठिन लगता है क्योंकि असाधारण हमलों के विरुद्ध अति असाधारण जोखिम लेनी पड़ती है-जिसका माद्दा हमारे प्रधानमंत्री या राजनीतिक दलों में तो लेशमात्र भी दिखलाई नहीं पड़ता। जॉर्ज बुश को अफगान और इराक युद्ध के लिए इतना कोसा गया है कि कोई अंत नहीं, किंतु मीडिया अमेरिकी नागरिक यह भूल रहे हैं कि उस कलंक को लेने का माद्दा दिखाने के कारण ही अमेरिका में आतंक की फिर कोई घटना नहीं घटी।

सिलसिलेवार आतंकी हमलों से यह ‘तीसरे विश्व युद्ध’ जैसा कोई बर्बर संघर्ष बनता जा रहा है। इसकी लड़ाई में कौन से देश मित्र हैं, कौन शत्रु-कुछ समझ में नहीं आएगा। इसकी लड़ाई सरकारें, राजनीतिक नेतृत्व या सुरक्षा बल अकेले नहीं लड़ सकेंगे-इस युद्ध में हम सबको मोर्चा संभालना होगा। प्रखर राष्ट्रवाद से ही जीता जा सकेगा ऐसा अंधा विश्व युद्ध।





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