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माधव नेशनल पार्क में गूंजी बाघों की दहाड़

शिवपुरी. माधव राष्ट्रीय उद्यान में करीब 12 वर्ष बाद टाइगर्स की दहाड़ गूंजी है। जोड़े में आए इन नर व मादा टाइगर्स को पार्क प्रबंधन ने नहीं मंगाया है बल्कि वे अपने आप कहीं से आ गए हैं। हालांकि इन्हें अभी तक पार्क के गश्ती दल ने नहीं देखा है लेकिन ग्रामीणों को ये समय-समय पर दिखाई दिए हैं जो सूचनाएं पार्क प्रबधन को मिली हैं।

इसके अलावा इनके पद चिन्ह भी मिले हैं जिससे इनकी मौजूदगी पार्क क्षेत्र में होने की पुष्टि होती है। पार्क प्रशासन की मानें तो यह जोड़ा यहां स्थापित होने की कोशिश कर रहा है पार्क प्रबंधन भी यहीं चाहता है। 12 वर्ष बाद यह पहला मौका है, जब 375 वर्ग किमी में स्थित माधव राष्ट्रीय उद्यान में टाइगर की ‘दहाड़’ गूंजी है।

यहां टाइगर सफारी को खत्म हुए इतने वर्ष हो चुके हैं और तब से इस उद्यान में बाघ का अभाव बना हुआ था। इस कारण न केवल यहां पर्यटकों की आमद कम हो गई थी, बल्कि उद्यान का आकर्षण ही खत्म सा हो चला था। पर अब एक बार फिर उद्यान में जान आती नजर आ रही है और इसकी वजह वह मेहमान टाइगर जोड़ा है, जो यहां अपनी आमद दर्ज करा चुका है और लगातार इस जोड़े के पद चिन्ह एवं उद्यान में होने के सबूत मिल रहे हैं।

उद्यान में पहला नर टाइगर नवंबर 2007 में प्रवेश किया था। इस टाइगर के पैरों के निशान मिलने के बाद उद्यान के गश्ती दल को इसके द्वारा शिकार किए गए वन्य जीवों के शव मिले थे। इससे यह बात साफ हो गई थी कि पार्क सीमा में बलारपुर एरिया में एक टाइगर मौजूद है।

उद्यान के अफसरों ने इस टाइगर को कैमरे में कैद करने के लिए कई प्रयास किए। पर वे सफल नहीं हो पाए। बावजूद इसके गश्ती दल लगातार अपनी उपस्थिति इलाके में बनाए रहे और विभिन्न परीक्षणों से उद्यान के अफसरों ने यह साबित किया कि उद्यान अब टाइगर विहीन नहीं है। अभी इस खुशी को उद्यान के अफसर पूरी तरह से बांट नहीं सके थे कि एक पखवाड़े पूर्व उद्यान में स्थित सैलिंग क्लब के निकट एक मादा टाइगर के पैरों के निशान मिले हैं। इन निशानों के परीक्षण से यह साफ हो गया है कि उद्यान में अब एक टाइगर नहीं है, दो हैं और वे भी नर व मादा। उद्यान संचालक आलोक कुमार के मुताबिक उद्यान में टाइगर्स की मौजूदगी के संकेत मिनले के बाद बाद गश्त बढ़ा दी गई है और हर स्तर पर इन टाइगर्स पर नजर रखी जा रही है। इसके अलावा इन टाइगर्स को कैमरे में कैद करने के लिए सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान से दो कैमराट्रेस भी मंगाए गए हैं।

कैसे काम करेंगे कैमरा ट्रेस
माधव राष्ट्रीय उद्यान में घूम रहे टाइगर जोड़े के फोटो निकालने के लिए सतपुड़ा के जंगल से जो दो कैमराट्रेस मंगाए गए हैं, उन्हें जंगल के ऐसे भाग में पेड़ पर लगाया जाएगा, जहां टाइगर की आमदरफ्त सर्वाधिक होने के सबूत मिले हैं। कैमराट्रेस ऑटोमैटिक है और इसके सामने आने पर स्वत: ही टाइगर की वीडियो फिल्म बन जाएगी। इसके बाद यह परीक्षण किया जाएगा कि टाइगर कितना बड़ा है और उसकी क्या गतिविधियां हैं। फिलहाल इस कैमराट्रेस को स्थापित करने में उद्यान प्रशासन को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसकी वजह यह है कि ऑटोमैटिक कैमराट्रेस के फंक्शन यहां के कर्मचारी समझ नहीं पा रहे हैं।

सुल्ताना होटल के पीछे मिले पद चिन्ह
मादा टाइगर सैलिंग क्लब के नजदीक चीतल रोड पर घूमकर वापिस हुआ है। एक पखवाड़े पूर्व मादा टाइगर के पद चिन्ह सुल्ताना होटल के पीछे से उद्यान के स्टाफ मिले हैं। यह वह स्थान है, जहां एक वर्ष पूर्व तक एक मादा शेरनी शिवानी को पिंजरे में कैद कर रखा गया था।

पैरों के आकार से हुई नर-मादा की पहचान
उद्यान के संचालक के मुताबिक, नवंबर 2007 के बाद जिस टाइगर के पैरों के निशान स्टाफ को लगातार मिले हैं, उसके पैरों का आकार वर्गाकार था, जबकि एक पखवाड़े पूर्व जिस टाइगर के निशान मिले हैं, उसके पैर आयाताकार हैं। वन्य प्राणी विशेषज्ञों द्वारा किए गए पैरों के परीक्षण से यह बात साफ हुई है कि उद्यान में नर और मादा दोनों टाइगर हैं और वे यहां घूम रहे हैं।

वन्य प्राणी विशेषज्ञ ने टाइगर के होने की पुष्टि की थी
एक माह पूर्व राष्ट्रीय उद्यान प्रशासन द्वारा टाइगर के पद चिन्हों के परीक्षण के लिए वन्य प्राणी विशेषज्ञ रिटायर्ड मुख्य वन संरक्षक पीएम लाड को भोपाल से शिवपुरी बुलाया गया था। श्री लाड ने उद्यान के अफसरों को यह बताया था कि लगातार टाइगर पर नजर रखने के लिए गश्त बढ़ाई जाए। उद्यान के सूत्रों का कहना है कि श्री लाड ने दो दिन तक उद्यान में रहकर सभी चीजों पर गौर कर टाइगर के यहां रहने की पुष्टि की थी।

गुना-अशोकनगर की सीमा से आए मेहमान
उद्यान के अफसरों का मानना है कि एक के बाद एक नर और मादा टाइगर राष्ट्रीय उद्यान में आए हैं और ये टाइगर अशोकनगर-गुना की सीमा से शिवपुरी में प्रवेश किए हैं। अफसरों के मुताबिक इससे पूर्व वर्ष 2004 में सतनवाड़ा क्षेत्र में एक मादा टाइगर दिखाई दी थी जिसे पकड़कर कुछ समय तक पार्क में रखा गया जहां इसका नाम शिवानी रखा गया बाद में उसे भोपाल भेज दिया गया।

तैयार हो रही है फैक्ट फाइल
माधव राष्ट्रीय उद्यान में नवंबर 2007 के बाद से नर और मादा टाइगर के पैरों के निशान, उनके द्वारा शिकार किए गए वन्य जीवों के शव एवं बिस्टा आदि जो भी सामग्री उद्यान के अफसरों को मिली है, उसकी फैक्ट फाइल तैयार की जा रही है।

उद्यान के संचालक आलोक कुमार का कहना है कि पद चिन्ह मिलने के बाद हम उसके प्लास्टर कास्ट बनाते हैं और फाइल तैयार कर कब मिला, कहां-मिला आदि तथ्य दर्ज करने के साथ ही पैरों के निशानों की लंबाई चौड़ाई की नापजोख करते हैं।

13 टाइगर थे 12 साल पूर्व
माधव राष्ट्रीय उद्यान में संचालित टाइगर सफारी में 12 साल पूर्व तक तेरह टाइगर थे। एक-एक कर ये टाइगर यहां से निकाले गए। इसकी वजह यह थी कि सेंट्रल जू अथारिटी आफ इंडिया ने इस उद्यान को टाइगर के लिए असुरक्षित करार दे दिया था। इसी के आदेश पर ही उद्यान से टाइगर सफारी खत्म किया गया था। अथारिटी की रिपोर्ट थी कि टाइगर सफारी में टाइगरों के हैबीटार्ट को विकसित नहीं किया जा सकता है और यहां वे सुरक्षित नहीं हैं। यह टाइगर सफारी वर्ष 1996-97 में खत्म किया गया था । इसके बाद उद्यान टाइगरविहीन हो गया था। यहां के सभी तेरह टाइगर्स को गुजरात के जू, वन बिहार भोपाल आदि में स्थानांतरित किया गया था।

करीब 12 वर्ष से टाइगर के अभाव से जूझ रहे माधव राष्ट्रीय उद्यान में एक वर्ष से टाइगर का एक जोड़ा स्थापित होने की कोशिश कर रहा है। नर और मादा टाइगर के उद्यान में होने की पुष्टि उनके पद चिन्हों, शिकार किए गए जानवरों एवं अन्य चीजों से हुई है। इन टाइगर्स के फोटो निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं और कोशिश की जा रही है कि ये टाइगर स्थायी तौर पर उद्यान में बसें, ताकि इससे और भी टाइगर्स पैदा होंगे, जो उद्यान के आकर्षण को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होंगे।
- आलोक कुमार,संचालक, माधव राष्ट्रीय उद्यान





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