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समूचा नया सिस्टम खड़ा करना होगा

आतंकी हमला होने के बाद इस तरह के हमलों की मार को कम करने या बर्बादी को रोकने से ज्यादा जरूरी यह है कि हम ऐसे हमले होने ही न दें। यह अत्यंत काल्पनिक स्थिति है लेकिन यदि मुंबई की पुलिस का नेतृत्व मेरे हाथ में होता तो मेरा पहला प्रयास यही रहता कि शहर या राज्य की पुलिस ऐसे सिस्टम के तहत काम करे, जिसमें आतंकवादियों के लिए ऐसा हमला करना संभव ही न हो। इसके बाद भी यदि आतंकवादी अपने मनसूबों में कामयाब हो जाते तो पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों की तरफ से अगले ही पल कड़ी जवाबी कार्रवाई की जाती।

आतंकवादी हमले को रोकना ही आतंकवाद से लड़ने का असली व सबसे कारगर औजार है। पहले ही काफी देर हो चुकी है। अब और देर न करते हुए आज और अभी हमें कड़े आतंकवाद निरोधक उपाय अमल में लाने चाहिए। देश की मौजूदा स्थिति व मुंबई के हालात को देखने के बाद मुझे लगता है कि यदि देश में सबसे पहले कोई चीज या ढांचा बदला जाना चाहिए तो वह है प्रधानमंत्री की टीम। प्रधानमंत्री की सुरक्षा टीम अब तक बिल्कुल अनुपयोगी साबित हुई है।

देश में एक के बाद एक आतंकवादी हमले हुए और हो रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री की यह टीम न तो प्रभावी सलाह दे सकी, न ही ऐसे हमलों को रोकने वाला एक मजबूत खाका ही बना सकी। हालांकि पांच साल बीत चुके हैं और सरकार ने काफी देर कर दी है, फिर भी और समय न गंवाते हुए प्रधानमंत्री को अपनी सुरक्षा टीम तुरंत बदलनी चाहिए। ऐसी टीम देश को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती। मुझे यह भी लगता है कि देश का गृह-मंत्रालय इस समय इतना सक्षम नहीं है। गृह मंत्रालय में अच्छे अफसरों की सख्त कमी है।

यहीं कारण है कि महत्वपूर्ण सूचना जुटाने में हम लगातार विफल हो रहे हैं। साथ ही प्राप्त सूचना का भी सही उपयोग नहीं हो पाता। मुझे याद है कि सुप्रीम कोर्ट ने १२ सितंबर, 2006 को पुलिस सुधार संबंधी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश पास किए थे। १२ जनवरी, 2007 को एक बार फिर इन सुधारों को कोर्ट की मंजूरी मिली, लेकिन अभी तक ये पुलिस सुधार अमल में नहीं लाए गए। पुलिस सुधार अगर आज अमल में लाए जाते हैं तो उसका असरदार प्रभाव देखने को मिलेगा।

दरअसल पुलिस सुधार के जरिए जहां पुलिसकर्मियों को एक और बिना राजनीतिक दखल अपना काम करने की छूट होगी, वहीं वे ज्यादा जिम्मेदार भी बनेंगे। मेरा मानना है कि फिलहाल हमारी पुलिस बहुत असरदार साबित नहीं हो रही है और इसके कई कारण है। देश को आतंक से बचाने के लिए दो महत्वपूर्ण तकनीक अमल में लाई जा सकती है। पहली का जिक्र हो चुका है, जिसके तहत हमारी फोर्स व इंटेलीजेंस को हमले रोकने में समक्ष बनना होगा। अभी यदि कोई पॉलिसी अमल में लाई जाती है तो उसका असर अगले दो-तीन सालों में दिखना शुरू होगा, क्योंकि पॉलिसी को अमल में लाने के लिए एक पूरा सिस्टम खड़ा करना होगा, जिसमें निश्चित ही समय लगेगा।

नई पॉलिसी के तहत प्रधानमंत्री तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाएं। सभी राजनीतिक दलों की मंजूरी से आतंकवाद से लड़ने के लिए एक फेडरल एजेंसी बने। इस फेडरल एजेंसी को विशेष अधिकार दिए जाने चाहिए। केवल फेडरल एजेंसी से काम नहीं चलेगा, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ फेडरल कानून भी बनाया जाए। दूसरी सबसे बड़ी चीज है तुरंत जवाबी कार्रवाई। देश को मुंबई जैसे आतंकी हमले का जवाब तुरंत देना चाहिए, लेकिन हम ऐसा तभी कर सकते हैं, जब हमारी तैयारी पहले से हो। साथ ही तैयारी पुख्ता व आधुनिक होनी चाहिए। मुंबई में हुए हमले से निपटने के लिए हम दिल्ली से सहायता मिलने तक इंतजार नहीं कर सकते। इसमें घंटों लगते हैं और इस दौरान आतंकवादी अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब हो गए।

पुलिस होने के नाते मुझे लगता है कि यदि मैं मुंबई में इस किस्म के आतंकवाद से लड़ रही होती तो मुझे स्ट्रांग एंटी टेरर लॉ की जरूरत होती। देश में आतंकवाद से निपटने के लिए कड़े कानूनों की बहुत जरूरत है। कड़े कानूनों के आभाव में पुलिस का मनोबल कम हो जाता है। मुझे बहुत जानकारी तो नहीं है क्योंकि पिछले कई घंटो से मैं लगातार सफर कर रही हूं पर ऐसा जान पड़ता है कि मीडिया ने इस पूरे प्रकरण पर काफी भ्रामक रिपोर्टिग की है। यह मीडिया की गैरजिम्मेदारी से ज्यादा पुलिस की अनुभवहीनता है। मुंबई पुलिस को तुरंत मीडिया समेत सभी सामान्य जन को प्रभावित होटलों व स्थानों से दूर करना चाहिए था।
- किरन बेदी पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं।





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