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आतंकवाद के असली कारणों की खोज

मुंबई मे जिस तरह से आतंकवादियों ने बिल्कुल अलग तरीकों का इस्तेमाल किया, क्या वह इस बात का संकेत है कि अब नए जमाने के आतंकी भी आतंक फैलाने के लिए नित नई रणनीतियों की खोज में जुट गए हैं? फिलिप बोबिट द्वारा हाल ही में लिखी गई ‘टेरर एंड कान्सेंट’ इसी बात को पुष्ट करती है। आतंकवाद पर लिखी गई पुस्तकों की श्रेणी में यह ताजी किताब है। किताब में फिलिप बताते हैं कि अब आतंकी भी हाई-टेक हो गए हैं।

20वीं सदी की आयरिश रिपब्लिकन आर्मी (आईआरए) जिन तरीकों का इस्तेमाल करती थी, 21 वीं सदी के अलकायदा की रणनीति उससे बिल्कुल अलहदा है। फिलिप अपनी इस किताब की शुरुआत 17वीं व 18वीं सदी के जलदस्युओं के आतंक से करते हुए आज के अलकायदा के आतंकवाद तक आते हैं (यह अलग बात है कि जलदस्युओं का आतंक आज भी जारी है और सोमालिया के जलीय इलाके में यह एक बड़ी वैश्विक समस्या बन चुका है)। फिलिप आज के आतंकवाद को कल के आतंकवाद से बिल्कुल अलग बताते हुए उसे सही संदर्भो में परिभाषित करने पर जोर देते हैं।

वे साफ कहते हैं, ‘आतंकवाद की इस लड़ाई मंे हम तब तक विजेता बनकर नहीं उभर सकते, जब तक कि इस समस्या के नवीन पहलुओं को नहीं समझ पाएंगे।’ भारत के संदर्भ में भी किताब बेहद प्रासंगिक है। खासकर तब जब यह ‘राज्य प्रायोजित आतंकवाद’ की बात करती है, तो इसका इशारा कहीं न कहीं हमारे पड़ोसी की तरफ होता है। अपनी किताब में फिलिप जिस ‘कन्सेंट’ या सहमति की बात करते हैं, वह यही राज्य प्रायोजित आतंकवाद है। हालांकि यहीं एक विरोधाभास भी देखने को मिलता है। अमेरिका द्वारा इराक पर हमले को बड़ी रणनीतिक गलती बताते हुए वे कहते हैं कि यह मानना भारी भूल होगी कि आतंकवाद पर नियंत्रण उन देशों पर नियंत्रण करके किया जा सकता है, जो आतंकवाद की उर्वरा भूमि बने हुए हैं। अलकायदा के जिक्र के साथ उनका कहना है कि यह देशों की सीमाओं से परे जा चुका है।

सवाल यह है कि आखिर आतंकवाद का कोई अंत है भी ? है तो किस तरह से? इसका सीधा-सीधा समाधान तो नहीं, लेकिन वे कुछ विचार जरूर हमारे सामने रखते हैं, जो खासकर भारत के संदर्भ में और भी प्रासंगिक हैं। फिलिप कोलंबिया में सेंटर फॉर सेक्योरिटी के प्रमुख के पद पर कार्य कर चुके हैं और इसलिए सुरक्षा के पहलुओं को बेहतर ढंग से जानते हैं। अपने अनुभवों के आधार पर वे लिखते हैं, ‘जब तक 20वीं सदी की सोच के अनुसार चलते रहेंगे, तब तक आतंकवाद को काबू में करना असंभव रहेगा।’ उनका इशारा यही है कि आतंकवाद से लड़ने के लिए उन्हीं हथियारों का इस्तेमाल करना होगा जो आज के आतंकी कर रहे हैं।

वे लिखते हैं कि यह समझना भी गलत है कि आतंकवाद पर महज पुलिस एक्शन से काबू पाया जा सकता है। वे एक ऐसे सिस्टम की वकालत करते हैं जिसमें आतंकियों के मंसूबों को पहले से ही भांपा जा सके। लेकिन इसके लिए खुफिया एजेंसियों को चाक-चौबंद करना होगा। फिलिप की यह किताब ऐतिहासिक तथ्यों के आईने में और आतंकियों की भावी रणनीतियों के आधार पर आतंकवाद का विहंगम दृश्य तो प्रस्तुत करती है, लेकिन जड़-मूल से इसका खात्मा कैसे हो, इस बारे में कमोबेश चुप्पी साधे हुए है। या तो लेखक उन आदर्शवादी जुमलों से बचना चाहते हैं जो व्यावहारिक धरातल पर फिलहाल तो फलीभूत होते नजर नहीं आते। या फिर उन्हें विश्वास है कि बेहतर रणनीति बनाकर आतंकवाद को नेस्तनाबूद किया जा सकता है।





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