Breaking News 
bhaskar Web English


HomeVichaar Vichaar

आतंक का लाइव टेलीकास्ट क्यों?

एक सुरक्षा विशेषज्ञ के मुताबिक हर आतंकी हमले के बाद राजनेताओं की बयानबाजी और मीडिया के आधे-अधूरे विश्लेषण से भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। हर बार ‘खुफिया विभाग की असफलता,’, ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी’ और ‘सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद न होने’ जैसी बातें कही जाती हैं, जिनका कोई खास मतलब नहीं होता। इसके अलावा जनता की भी इसके बारे में अलग-अलग राय होती है।

बहरहाल हमारा देश और मुंबई महानगर धीरे-धीरे इस फियादीन हमले से उबर जाएगा, लेकिन हमारे नागरिक समाज को यह सोचना होगा कि अगर भविष्य में कभी ऐसे हमले होते हैं तो वह इसका सामना कैसे करेगा। कौन जानता है कि इस तरह के उन्मादी दर्जनों आतंकवादी अगली बार कहां हमला कर दें?

वास्तव में किसी को भी दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि किसी ने पहले इस तरह के फियादीन हमले को नहीं देखा। इस हमले के बाद ऐसा भी हो सकता है कि कुछ आतंकवादी बच गए हों और भीड़ में कहीं खो गए हों। ऐसे में इसके अलावा और क्या कहा जा सकता है कि हमने परिस्थितियों को ठीक से नहीं संभाला। होना यह चाहिए था कि तमाशबीन भीड़ को घटनास्थल से काफी दूर खदेड़ दिया जाता, आसपास की इमारतों को खाली कराकर बंद कर दिया जाता और बुधवार को जब हमला हुआ था, उसके तुरंत बाद टीवी चैनलों को तुरंत इसका प्रसारण करने से रोक दिया जाता।

विशेषज्ञों ने बार-बार इस बात की ओर इशारा किया है कि आतंकवादी प्रचार चाहते हैं और हमारे चौबीसों घंटे चलने वाले टीवी चैनलों ने इस घटनाक्रम का उन्मादी तरीके से अनवरत सीधा प्रसारण कर उनकी यह मंशा भी पूरी कर दी। कौन सा आदमी डर रहा है, कौन सी महिला खिड़की से बाहर आ रही है, कितने शव इन इमारतों से निकाले जा रहे हैं, इस सबको टीवी चैनलों पर पूरे विस्तार से दिखाया गया। आतंकवादी इससे ज्यादा और क्या उम्मीद करते।

यह कोई दिलासे की बात नहीं थी कि इन होटलों में टीवी सिग्नलों को बाधित कर दिया ताकि आतंकवादियों को उनके खिलाफ हमारे सुरक्षाकर्मियों द्वारा की गई घेरेबंदी के बारे में कोई सुराग न मिल सके। 24 घंटे चलने वाले टेलीविजन चैनलों के लोगों को होटल के बाहर इकट्ठा होने और इसे एक बड़े तमाशे में तब्दील करने की छूट दी गई। जिस तरह पूरी दुनिया ने इस आतंक को देखा, हो सकता है इस हमले का मास्टरमाइंड खुश हो और इन आतंकवादियों तक मोबाइल या सेटेलाइट फोन के जरिए बधाई के संदेश पहुंचाए गए हों।

हालांकि यह बात सच है कि मीडियाकर्मी अपना काम कर रहे थे। लेकिन जिस तरह भयावह दृश्य जारी किए गए, उसे देखकर लगा कि सुरक्षा व्यवस्था को पहले इन होटलों के इर्द-गिर्द दो किलोमीटर के इलाके को सील कर अपने कब्जे में ले लेना चाहिए था, सड़कें ब्लॉक कर दी जातीं और फिर कमांडोज को बिना कैमरों की लगातार जांच-पड़ताल के अपना काम करने दिया जाता तो बेहतर होता। लोकतांत्रिक नीति के तहत लोगों को सूचना से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, होटल में फंसे लोगों के परिजनों को भी कुछ भरोसा मिलना चाहिए था। लेकिन पल-पल होते धमाकों के प्रसारण से तो निश्चित ही उन्हें भरोसा नहीं मिला होगा।

ऐसे भयानक और प्रचार की मंशा से किए गए आतंकी हमलों को प्रचार से बिलकुल अछूता रखना ही तार्किक जवाब हो सकता है। लेकिन इस हफ्ते मुंबई में इसका बिलकुल उल्टा हुआ जहां सुरक्षाकर्मी और कमांडो भी कैमरे पर बातचीत करने के लिए तैयार नजर आए। लगातार दो रातों तक ताज और ट्राइडेंट होटलों के बाहर का इलाका दिवाली की तरह रौशन रहा और इसने देशवासियों को भी यह मौका दिया कि वे अपने ड्राइंग रूम में बैठकर देखें कि एनएसजी कमांडो किस तरह आतंकवादियों का मुकाबला कर रहे हैं। यहां की बिजली संभवत: इसलिए बंद नहीं की गई क्योंकि सुरक्षाकर्मी रात में देखने लायक जरूरी साजो-सामान से लैस नहीं थे।

यह असफलता पुलिस की तैयारियों को फिर से जांचने की जरूरत पर बल देती है। दूसरा सवाल जो झकझोरता है, वह है हेमंत करकरे की मृत्यु। क्या एक पुलिस अधिकारी की सचमुच मौत होनी चाहिए? किसी आतंकवाद विरोधी दस्ते के मुखिया ने आखिरी बार कब गोली चलाई थी? पिछले १५ सालों में एक भी बार नहीं। इतने सालों तक वे फाइलें सरकाते, योजनाएं बनाते और मामलों की पड़ताल करते रहे। लेकिन उनके जैसे पुलिस अधिकारी के लिए यह पहला मौका था, जब वे आतंकवादी की अंधाधुंध बरसती गोलियों के बीच फंस गए। यह करकरे और उनके साथियों की अनुभवहीनता ही थी कि वे सुरक्षा उपायों के बगैर सीधे आतंकवादियों को पकड़ने कामा अस्पताल में घुस गए।

करकरे को उस समय कंट्रोल रूम में होना चाहिए था। या तो उन्होंने और उनके साथियों ने स्थितियों का बिल्कुल गलत आंकलन किया या उनके पास पर्याप्त संख्या में आदमी नहीं थे। दोनों ही स्थितियां डराने वाली हैं। अब पुलिस को भी घातक हथियारों से चाक-चौबंद करने की दुहाई दी जा रही है, लेकिन मुंबई के आतंकवादी हमले जैसी घटनाओं से बचाव दरअसल पुलिस का काम नहीं है। सड़कों को घेरने के अलावा वर्दी वाले व्यक्ति से कुछ और भी उम्मीदें की जाती हैं, जैसेकि कंट्रोल रुम का संचालन, हेल्पलाइन और कम्युनिकेशन नेटवर्क पर मुस्तैद होना वगैरह। आतंकवाद का मुकाबला आतंकवाद से नहीं किया जा सकता। यथार्थ की सही और बारीक समझ से ही यह संभव हो सकता है।

आतंकवादियों के धन के स्रोतों को खत्म करके, जहां से उन्हें मदद मिलती है, उन्हें समाप्त करके और उनके कामों और संचार को मुश्किल बनाकर ही ऐसी गतिविधियों को रोका जा सकता है। गहरी संवेदना और दृढ़ता के साथ और भारत और पाकिस्तान को भी एकजुट होकर आतंकवाद के संकट से लड़ना चाहिए।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: