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भारत में आतंकवाद राहु का भ्रमजाल

आतंकवाद धीरे-धीरे अपना अलग धर्म अपनाता जा रहा है। अभी-अभी हमने मुंबई में आतंक का नंगा नाच देखा। इसकी वजह राहु का भ्रमजाल है। इसी कारण आतंक का दायरा बढ़ रहा है। अब यह आतंक किसी धर्म या समुदाय के अधीन नहीं है। इसे हर धर्म या संप्रदाय के लोग अपनाते जा रहे हैं। कुछ जल्दी पैसा कमाने के लिए तो कुछ अपने हक की लड़ाई के लिए। अब यह लोगों के प्रतिशोध का तरीका बन गया है, जो देश के लिए हितकारी नहीं है। इस आतंकवाद का अगर ज्योतिषीय विश्लेषण किया जाए तो तस्वीर साफ-साफ दिखने लगती है।

आमतौर पर आतंकवादियों की जन्मकुंडली में संवेदनहीनता के कई योग होते हैं, जो उस जातक की कुंडली में हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। यह योग निर्मित करने में चंद्र, मंगल, राहु और केतु की अहम भूमिका होती है। कतिपय लोग इस योग में चंद्र को जोड़ने से शायद सहमत न हों, लेकिन चंद्रमा को मन का स्वामी कहा गया है। जब इनके साथ क्रूर ग्रह बैठते हैं और पाप ग्रह की दृष्टि पड़ती है तो जातक के मन में हिंसक प्रवृत्ति जाग्रत हो जाती है और वह दूसरों को नुकसान पहुंचाने में जरा भी पीछे नहीं रहता। राहु राक्षसों का सेनापति है और षड्यंत्र करने में या कूटनीति में कोई भी ग्रह इससे विजय नहीं पा सकता। ये स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरे का नुकसान करने में जरा भी नहीं हिचकते। स्वतंत्र भारत की कुंडली में अनंत नामक कालसर्प योग बना हुआ है।

भारत की आजादी के समय जो मुहूर्त निकाला गया है, उसमें भी त्रुटियां थीं। वृष लग्न की तत्कालीन कुंडली में मारकेश मंगल द्वितीय भाव में बैठे थे, जो कुटुंब का भाव होता है। ज्योतिषी दृष्टि से देखा जाए तो स्वतंत्र भारत की जन्मकुंडली में भी त्रुटियां है। ज्योतिष का यह योग कभी भी देश में शांति स्थापित नहीं होने देगा। यद्यपि गुरुदेव बृहस्पति की दृष्टि मंगल पर पड़ रही है, किंतु वृष लग्न की कुंडली में गुरु भी पाप फल देने वाले होते हैं। इसलिए देश को हमेशा अंतर्कलह से जूझना होगा, चाहे वह जातिवाद हो या नक्सलवाद या आतंकवाद। उसमें सबसे घातक योग बृहस्पति के शत्रु भाव में जाने से बना है।

बृहस्पति भी हमेशा अपनी नकारात्मक भूमिका ही निभा रहे हैं। छठे भाव में बृहस्पति गुप्त शत्रुओं की अधिकता करते हैं। इसलिए देश में जो गुप्त शत्रु होंगे, वह भी काफी पढ़े-लिखे होंगे। आज तक स्वतंत्र भारत की कुंडली में जब भी बृहस्पति चौथे, छठे, आठवें और बारहवें भाव में भ्रमण करते हैं, उस दौरान राहु और केतु द्वारा निर्मित कालसर्प दोष ने अपना असर दिखाया है।

अभी भी लग्न कुंडली में आठवें और चंद्र कुंडली से छठे बृहस्पति धर्म पर कुठाराघात करवाते रहेंगे। राहु का लग्न में होना शीर्ष नेतृत्व के लिए शुभ नहीं रहता। जातक कुंडली में भी यदि राहु लग्न में हो तो वह भ्रमित करता रहता है। यही हाल देश का भी है। शीर्ष नेतृत्व कभी भी सत्य और सही फैसले लेने में हिचकता रहता है। जितनी भी सरकारें आईं, सभी ने देश की अनुशासन शक्तियों और खुफिया तंत्रों का प्रयोग अपनी जघन्य स्वार्थ सिद्धि के लिए किया। यही देश और देशवासियों का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। वर्तमान समय में भी खुफिया विभाग ही पिस रहा है। अभी दिसंबर में तस्वीर साफ होगी।

अभी हाल ही में मुंबई में हुआ आतंकवादी हमला इस तथ्य का जीता-जागता उदाहरण है क्योंकि कुछ महीने पहले ही आतंकवादियों ने कहा था कि हम 26 नवंबर को मुंबई में दीवाली मनाएंगे, लेकिन भारत की कुंडली में राहु के दुष्प्रभाव के फलस्वरूप हमारे जितने भी खुफिया विभाग हैं, चाहे वो आईबी हो या सीबीआई हो अथवा अन्य खुफिया तंत्र, उग्रवाद संबंधी गतिविधियों की जानकारी पाने में ये नगण्य साबित हुए। पांच सितारा होटल में टनों गोला-बारूद बम का जखीरा लेकर गए उग्रवादियों की किसी को भनक तक नहीं, क्योंकि ग्रहों के दुष्प्रभाव के फलस्वरूप ये खुफिया विभाग केवल राजनीतिक दबाव का फायदा उठाने के हथियार बनकर रह गए हैं।

ज्योतिषीय दृष्टि से मुंबई की घटना से यदि सरकार ने सबक नहीं लिया तो उसे आने वाले समय में जल्दी कमांडों कार्यवाही की पुन: जरूरत पड़ेगी। ८ दिसंबर को जब बृहस्पति अपनी राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे तो देश के सभी धार्मिक गुरु चाहे हिंदू हों, मुस्लिम हों या फिर अन्य धर्म के हों, उन पर से सताए जाने वाले संकट के बादल कुछ छटेंगे, लेकिन चूंकि बृहस्पति 12 वर्ष बाद नीच राशिस्थ हो रहे हैं, इसलिए धर्म और संप्रदाय के नाम पर घृणित राजनीति का खेल जारी रहेगा और तमाम धर्माचार्यो पर तरह-तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगते रहेंगे। आगामी नए संवत्सर के (२क्६६) के राजा शुक्र और मंत्री चंद्र रहेंगे। फलस्वरूप वर्ष २क्क्९ में भी वर्चस्व की लड़ाई जारी रहेगी।

वर्ष 2009 के वर्ष लग्न में गुरु और राहु के एक साथ मकर राशि में होने से चाण्डाल योग का निर्माण हो रहा है। अत: 2009 भी शांति से रहने नहीं देगा। देश को आतंकवाद से कोई खतरा नहीं है, किंतु शीर्ष पद पर बैठे नेताओं और उनकी नीतियों से बराबर खतरा रहेगा। अत: आतंकवाद को जनमानस की जागरूकता ही समाप्त कर सकती है। इस देश और जनता को राजनीतिज्ञों की छद्म स्वार्थपरक नीतियों से आगे भी लड़ना है।

संकट के ग्रह..
8 दिसंबर को जब बृहस्पति अपनी राशि से मकर राशि में प्रवेश करेगा तो देश के सभी धार्मिक गुरु चाहे हिंदू हों, मुस्लिम हों या फिर अन्य धर्मो के हों, उन सभी पर से सताए जाने वाले संकट के बादल कुछ छटेंगे, लेकिन चूंकि बृहस्पति 12 वर्ष बाद नीच राशिस्थ हो रहा है, इसलिए धर्म और संप्रदाय के नाम पर घृणित राजनीति का खेल बदस्तूर जारी रहेगा और तमाम धर्माचार्यो पर तरह-तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगते रहेंगे। आगामी नए संवत्सर के (2066) के राजा शुक्र और मंत्री चंद्र रहेंगे। फलस्वरूप वर्ष 2009 में भी वर्चस्व की लड़ाई जारी रहेगी।





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