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जांबाज कंधों पर देश की सुरक्षा

मुंबई. datta जिस समय देशभर की निगाह न्यूज चैनलों पर गड़ी हुई थी, नेशनल सिक्युरिटी गार्ड (एनएसजी) के चीफ ज्योतिकृष्ण दत्ता एक साथ तीन स्थानों पर आतंकियों के मंसूबों को नाकाम करने में जुटे हुए थे। शुक्रवार सुबह 7 बजकर 10 मिनट पर उन्होंने मोर्चा संभाला।

नरीमन हाउस में उनके जवानों ने आतंकियों को छत से लेकर जमीन तक घेर लिया और दिनभर चली कार्रवाई के बाद आतंकियों को मार गिराया। ऐसा ही नजारा ओबेराय और ताजमहल होटल का भी था। दत्ता से सामने पहली चुनौती इन आतंकियों को मार गिराने के साथ बंधकों को सुरक्षित बचाने की थी। दूसरी चुनौती रिहायशी इलाके में जान-माल को हानि न होने देने की थी। उनकी रणनीति पर उनके कमांडो खरा उतरे और बंधकों को आतंक के साये से मुक्त कराया।

इस कार्रवाई को अंजाम देते हुए कमांडोज ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी। एनएसजी का एक मेजर और दो कमांडो इस ऑपरेशन में शहीद हुए हैं। अब दत्ता के इन कमांडोज की तुलना इजराइल के मराइन कमांडोज से की जाने लगी है जो दुनिया के सबसे बेहतर कमांडो माने जाते हैं। इजराइल ने भी नरीमन हाउस में आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए अपने कमांडो भेजने की पेशकश की थी लेकिन दत्ता को अपने जवानों पर पूरा भरोसा था और उन्होंने पेशकश ठुकरा दी। होटल ओबेराय और नरीमन हाउस में 48 घंटे के भीतर बंधकों को छुड़ाकर दत्ता की टीम ने सबसे बेहतर होने की बात साबित की है। इससे पहले किसी भी देश ने इतने कम समय में बंधकों को छुड़ाने में सफलता नहीं हासिल की।

रणनीति काम आई
एनएसजी के कमांडोज की सटीकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि होटल ताज में चल रही कार्रवाई के दौरान एक आतंकी ने जैसे ही खिड़की से झांका कमांडो की गोली उसके सिर में जा घुसी। ये कमांडोज जरा सी हरकत पर सटीक निशाना साधने में कुशल हैं। आतंकियों की ओर से लगातार हो रही गोलीबारी के कारण सुरक्षा एजेंसी बैकफुट पर थी। उसी समय दत्ता ने रणनीति बदली। कमांडोज को वायुसेना के हेलिकाप्टर से नरीमन हाउस की छत पर उतारकर ‘टॉप टू बॉटम’ की रणनीति को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। भारत में जम्मू-कश्मीर के बाहर घनी आबादी वाले शहरी इलाके में यह कार्रवाई पहली बार की गई। रिहायशी और भीड़भरे क्षेत्र होने के बावजूद इसमें किसी निदरेष की जान नहीं गई।

सबसे कम समय में बंधकों को छुड़ाया
दुनियाभर में आतंकियों के चंगुल से बंधकों को छुड़ाने के ऑपरेशनों में एनएसजी के जवानों ने मिसाल कायम की है। विश्व की कोई भी सुरक्षा एजेंसी इतने कम समय में सफलतापूर्वक बंधकों को नहीं छुड़ा पाई। चाहे वह 1972 में जर्मनी के म्यूनिख में हुए 11 इजराइली एथेसिट्स का मामला हो या 2004 में बेसलन के चेचेन्या में 1000 लोगों को बंधक बनाने का। एनएसजी के कमांडोज ने जान की परवाह किए बिना 48 घंटे के भीतर बंधकों को छुड़ा लिया। यह बात उन्हें दुनिया की किसी भी कमांडो फोर्स से बेहतर साबित करती है।

आतंकियों से उन्हीं के अंदाज में
एनएसजी के करीब साढ़े सात हजार जवान विशेष प्रशिक्षित रहते हैं। उन्हें इस बात की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है कि अगर आतंकी किसी को बंधक बना लेते हैं तो किस तरह मुक्त कराया जाए और आतंकियों से किस तरह निपटा जाए। एनएसजी के कमांडोज विषम परिस्थितियों में आतंकवादियों से निपटने में माहिर होते हैं। ये कमांडो आतंकवादियों से उन्हीं के अंदाज में निपटते हैं। इसी रणनीति के चलते ऑपरेशन में शहीद हुए कमांडोज ने आतंकियों की गोली की परवाह किए बिना अपने साथियों के लिए रास्ता बनाया। इसी के परिणाम स्वरूप आतंकियों को मारा जा सका।





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