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एक छत के नीचे होगा कैंसर मरीजों का इलाज

जयपुर. एसएमएस अस्पताल में कैंसर मरीजों का इलाज एक ही छत के नीचे हो सकेगा तथा इधर-उधर भागना नहीं पड़ेगा। सर्जरी विभाग के अंतर्गत बीकानेर के बाद एसएमएस में अलग से ओंकोलॉजी (कैंसर) विंग स्थापित की जा रही है। इसमें सभी तरह की जांच, सर्जरी, दवाएं, कीमोथैरेपी, रेडियोथैरेपी आदि की सुविधा उपलब्ध होगी।

यह जानकारी सर्जरी विभाग के डॉ.नारायण सिंह शेखावत ने दी। एसएमएस मेडिकल कॉलेज व एसोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ इंडिया (एएसआई) की राज्य शाखा के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय सर्जरी सम्मेलन ‘एसिराज-2008’ के उद्घाटन समारोह में शनिवार को शेखावत ने बताया कि अलग से स्थापित की जा रही विंग में कैंसर विशेषज्ञ हर समय उपलब्ध रहेंगे तथा इलाज में आसानी होगी। मरीजों की सुविधा को देखते हुए ही सर्जरी विभाग के तहत पॉलीट्रोमा में आईसीयू बनाने के लिए स्वीकृति मिल चुकी है। इसमें पांच मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर बनाए जाएंगे, जहां मरीजों को सभी सुविधाएं मिलेंगी।

सम्मेलन का उद्घाटन दक्षिण कमान के मेजर जनरल डॉ.बी.एस.राठौड़ ने किया। सम्मेलन में देशभर से करीब 300 शल्य चिकित्सकों ने भाग लिया। इस मौके पर अस्पताल अधीक्षक डॉ. एन.एस. शेखावत भी मौजूद थे। आयोजन सचिव डॉ.जी.के.अग्रवाल ने बताया कि दो दिन तक चलने वाले सम्मेलन में ब्रेस्ट कैंसर, आंतों का कैंसर आदि बीमारियों के आधुनिकतम इलाज पर चर्चा होगी। हार्ट अटैक के मुकाबले पेन्क्रिएटाइटिस पांच गुना ज्यादा : गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.रमेश रूपरॉय ने व्याख्यान देते हुए बताया कि हार्ट अटैक की तरह शराब का सेवन करने से एक्यूट पेन्क्रिएटाइटिस के मरीजों की संख्या बढ़ रही है और पांच गुना ज्यादा है। पित्त की थैली में पथरी होने पर भी यह रोग हो सकता है, जिसका इलाज दवाओं से संभव नहीं है। पथरी के पित्त नली में आकर अग्न्याशय की नली का रास्ता रोक देने पर एंडोस्कोपी तकनीक से इसे हटाकर पेन्क्रिएटाइटिस का इलाज किया जा सकता है।

सविता को मिला जीवनदान
नसं.जयपुर. एक निजी अस्पताल के चिकित्सकों ने हाल में चूरू निवासी सवितादेवी (25) की बच्चेदानी को बचाकर ‘गुनसैला ग्लोबल सर्कलाज तकनीक’ से ऑपरेशन करने में सफलता प्राप्त की है। अस्पताल में भर्ती के समय महिला अत्यधिक मात्रा में रक्त निकलने से बेहोशी की हालत में थी।

वह हृदयरोगी थी और उस समय उसकी हृदयगति 50 प्रति मिनट थी। सोनी अस्पताल की डॉ. अंजू सोनी ने बताया कि जांच में खून की कमी, संक्रमण फैलने की आशंका, क्लोटिंग कम हो गई थी। बच्चेदानी फैलकर झोले के समान हो गई थी तथा पेट में बच्च मृत था। ऐसी स्थिति में जनन प्रक्रिया को सुचारु रखने व बच्चेदानी को बचाकर ऑपरेशन किया गया, अन्यथा उसकी मौत हो जाती। ऐसे अधिकतर मामलों में बच्चेदानी को बाहर निकाल दिया जाता है।





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