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विशेष. सुबह रोने की आवाज से हुई। टीवी पर अमर जांबाजों के साथी सैनिकों द्वारा उनके पार्थिव शरीर पर तिरंगे तह कर सलीके से रखे जाने के दृश्य पर देशभर की अनेक महिलाओं के साथ मेरी पत्नी भी आंसू न रोक सकी। बाहर बच्चे को स्कूल वैन तक छोड़ने आई एक युवती सेलफोन पर रुंधे गले से बता रही थी कि बेटे ने अखबार देखकर कहा: मम्मी, इसके डैडी तो मर गए! भीतर मेजर उन्नीकृष्णन की मां फफक रही थीं। चैनल बदलने पर रतन टाटा को भर्राए गले से बोलते सुना। फिर ताज के स्वागत कक्ष में मातमी माहौल, बिखरे कांच, टूटते दिल और यह सब बताते हुए फूट-फूट कर रोती बरखा दत्त।
सारा राष्ट्र रो रहा था। किंतु यह कोई कमजोरी का क्रंदन नहीं था। न ही किसी विवशता का रुदन था। ये पलकें तो आहत होने से भीगी थीं। तीन दिनों से बंधी हिचकियों का खुलना था। कलेजा मुंह को आ गया था। सो फट पड़ा। अपनों को खोने का दुख था। किसी और के अपनों के जाने का दु:ख था। इजरायली बच्ची के माता-पिता के मारे जाने का सदमा ठीक उतना ही गहरा जितना ताज के जनरल मैनेजर की जयपुर में पढ़ चुकी पत्नी और दो बच्चों का। सब हिंदुस्तानी। जो भी आतंक के विरुद्ध- वे सब हिंदुस्तानी। जो भी आतंक के साथ- वे सब आतंकी। जैसे 9/11 पर फ्रांस के एक अखबार की हेडलाइन थी: आज हम सब अमेरिकी हैं।
26/11 को देश पर हमला, 29/11 को देश एकजुट
उस रात हमारे मुंह पर था कि हम पर आक्रमण हो गया। आतंक अंतहीन है। हमारा खून बहता जा रहा है। अब हमारे सीने शहीदों की शान में तने हुए हैं। कमांडो कितने ताकतवर हैं, उनकी हिम्मत की सानी नहीं, तीन दिन-रात चले इस खतरनाक ऑपरेशन के दौरान कई जांबाजों ने पानी तक नहीं पीया- ये बातें हमारे बीच हैं। हमले के दूसरे ही दिन गोलियों की बौछारों के बीच आम आदमी, युवतियां व छात्र भी, सुरक्षा बलों का हौसला बढ़ाने के लिए नारे लगा रहे थे। यह नया मुंबई था, नया हिंदुस्तान था। 1993 के खौफनाक मुंबई धमाकों के कुछ ही घंटों में शहर सामान्य हो गया था। इस बार नहीं हुआ। डटा रहा। एकदम निडर। इंडिया अटैक्ड से इंडिया युनाइटेड।
भ्रष्ट राजनीति, त्रस्त जनता
तीन साल में आतंकी हमलों में 800 निर्दोषों की जान जा चुकी हैं। किंतु क्या तब के और अबके प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री या एकाधे सांसद ने ही कभी गद्दी त्यागने की पेशकश तक की। न अटल बिहारी वाजपेयी में इतना माद्दा था कि किसी मंत्री को बर्खास्त करते, न डॉ. मनमोहन सिंह से ऐसे दमखम की किसी को उम्मीद है। गृहमंत्री शिवराज पाटिल इतने गैर-जिम्मेदार निकले कि 200 कंमाडों फोर्स को दो घंटे के भीतर मुंबई भेजने की अति गोपनीय, अति संवेदनशील जानकारी खुलेआम टीवी चैनलों को दे डाली। क्या इसलिए कि आतंकी मजे में टीवी पर देख सकें कि उनके मुकाबले के लिए सरकार कितनी देर में क्या करने जा रही है?
यही नहीं- आज तक कभी किसी शासनाध्यक्ष ने खुफिया तंत्र की नाकामी से इतनी जानें जाने के बावजूद किसी अफसर को बर्खास्त नहीं किया। क्यों? कोई रॉ प्रमुख, कोई आईबी प्रमुख, कोई गृहसचिव, कोई पुलिस प्रमुख आज तक किसी आतंकी हमले से खुद तो विचलित नहीं ही हुआ, कोई इनका बाल तक बांका न कर सका। जांचों के जीवाश्म अनंत हैं- उतने ही अजर हैं उच्च पदों पर बैठे निर्लज्ज नेता व अफसर। हालांकि पहली बार लोगों की घृणा इन सब के विरुद्ध खुलकर सामने आई है। नया हिंदुस्तान जो है।
समुद्री मार्ग: 15 साल बाद भी भंवर
1993 में मुंबई पर हमला इसलिए हो सका क्योंकि अरब सागर के सीने पर सवार होकर आतताइयों ने कोई 800 किलो आरडीएक्स भेजा था। समुद्री सीमा नौसेना और कोस्ट गार्ड के जिम्मे है। कस्टम का अमला भी तैनात रहता है। इनमें तब भी हक की लड़ाई थी, आज भी जारी है। 15 साल बाद इसी समुद्री छाती को चीरकर फिर आतंकी आ गए! इतने सालों में कुछ सबक न लिया? कुछ न बदला? हमारी समुद्री सीमा 7000 किलोमीटर की है- जिसकी देखभाल कितनी कमजोर है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि खुद रक्षा मंत्री एके एंटनी ने लोकसभा में स्वीकारा था कि आतंकी समुद्री मार्ग से आ सकते हैं। स्वीकारा तो सही,.. लेकिन किया क्या..? और उसी मार्ग से आतंकी आ ही गए तो एंटनी, शिवराज पाटिल की तरह पद पर बने हुए क्यों हैं ?
इस हमले में एनएसजी का एक लेब्राडॉर डॉग मारा गया, वहीं सैकड़ों कबूतर भी चल बसे। वे गोलियों से नहीं दहशत से मरे। एक फोटो में गोलियां चलाते हुए हमारे एक सैनिक के चारों ओर ढेरों कबूतर दिख रहे हैं। वे उड़ क्यों नहीं गए? संभवत: वे जानते थे कि ये गोलियां जान बचाने के लिए चलाई जा रही है- इसलिए डटे रहो। हिन्दुस्तान की कसम।