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दोस्ताना, देशद्रोही और जातिवाद

मुंबई. अमेरिका और भारत के महानगरों में कुछ लोग ‘दोस्ताना’ को पसंद कर रहे हैं। फिल्म में अभिषेक की मां किरण खेर अत्यंत दुखी मन से अपने पुत्र की समलैंगिकता को स्वीकार करती हैं और बहू के लिए सहेजे गए पारिवारिक कंगन अपने पुत्र के सखा, साथी, प्रेमी जॉन को भेंट करती हैं। उसे घर में बहू की तरह प्रवेश पर चावल से भरे लोटे को लात मारने को कहती हैं। बदलते हुए भारत में इस तरह के दृश्य को पसंद किया जा रहा है।

परंतु चिरंतन मूल्यों को अनदेखा नहीं किया जा सकता और कुछ कुरीतियां हैं जो हमेशा कायम रहती हैं। सारी आधुनिकता के बावजूद जातिप्रथा गणतांत्रिक चुनाव के चेहरे पर एक कालिख की तरह पुती हुई है। मुंबई से प्रकाशित दैनिक भास्कर के सहयोगी अखबार डीएनए में सुरेश कुमार का एक व्यंग्य कॉलम कमाल का है। पच्चीस नवंबर के अंक में वे लिखते हैं कि कमलेश अपनी मां कांताबेन को जोर देकर ‘दोस्ताना’ दिखाने ले गया।

शो के बाद कांताबेन समलैंगिकता वाली फिल्म से खफा थीं तो बेटे ने उन्हें बताया कि गब्बर समलैंगिक था और जय और वीरू भी समलैंगिक थे। कांताबेन ने इस बकवास का विरोध किया और जानना चाहा कि पुत्र क्या कहना चाहता है। इसी मौके की तलाश में छटपटाते कमलेश ने कांताबेन को बताया कि वह स्वयं भी समलैंगिक है तथा अपने मित्र जग्गू से विवाह करना चाहता है। कांताबेन ने अपने करम ठोंक लिए और कहा कि हे मूर्ख अगर तू समलैंगिक है तो कम से कम अपनी जाति का लड़का तो खोजता। हमारा जातिवाद कितना गहरा है इसका अनुमान उपरोक्त व्यंग्य से सहर्ष लगाया जा सकता है।

समलैंगिकता को आधुनिक दौर की उपज मानना गलत होगा। यह हमेशा से रही है परंतु इस पर खुलेआम चर्चा नहीं होती थी। इससे सहमत या असहमत होने को भी आधुनिकता की खूंटी पर अपने सदियों पुराने गंदे कपड़ों की तरह नहीं टांगा जा सकता क्योंकि आधुनिकता मात्र तर्कसंगत दृष्टिकोण है। तमाम यौन विकृतियों का विवरण हजारों वर्ष पूर्व लिखी वात्सायन की ‘कामसूत्र’ में भी पढ़ सकते हैं।

एक तरफ हम देखते हैं कि करण जौहर की ‘दोस्ताना’ अमेरिका, मुंबई, बेंगलूर और दिल्ली के मल्टीप्लैक्स में सफलता से दिखाई जा रही है तो दूसरी तरफ मुंबई और महाराष्ट्र में प्रतिबंधित ‘देशद्रोही’ बिहार और उत्तरप्रदेश में सफलता से दिखाई जा रही है। इस अनगढ़ सी सस्ती फिल्म में राज ठाकरे का विरोध किया गया है। सेंसर द्वारा अखिल भारत में दिखाने की अनुमति के विरुद्ध न्यायालय ने इसे कुछ क्षेत्रों में प्रतिबंधित किया है।

महाराष्ट्र की सरकार भी इसके प्रदर्शन से हिंसा का भय रखती है। यह सिर्फ हमारे देश में ही संभव है कि गुजरात दंगों पर आधारित फिल्में गुजरात में प्रतिबंधित हो जाती हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्षेत्रीयकरण किया जा रहा है जो इसकी समाप्ति का पहला चरण है।

आज हालात इतने बुरे हैं कि देश की अस्मिता ही खतरे में है, तब महज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या रोना रोएं। दरअसल देश की ऊर्जा और प्रतिभा उसकी राजनीति और चुनाव में कतई अनुदित नहीं हो रही है। देश की चिंता करने वाले तमाम लोग राजनीति को गंदा कहकर उससे किनारा कर चुके हैं और पाखंडी लोगों के लिए हमने यह क्षेत्र खुला छोड़ दिया है।





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