|
लीजिए! चुनावी तमाशा फिर शुरू। एक आम आदमी को फिर से आभास करवाया जा रहा है कि अभी जिंदा है और उसका उपयोग फिर एक बार किया जाना बाकी है। चुनावी दुंदुभी बज रही है और विदूषक उभरकर अपनी गाथा कहने को उतारू हैं। तमाशबीन फिर इकट्ठा होकर एक बार और इनकी लच्छेदार बातों में उलझकर तालियां बजाने को मजबूर हैं।
विपक्ष पर जितने प्रहार, उतनी ही ज्यादा तालियां। वाह रे लोकतंत्र! प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल पर जितनी ज्यादा दलदल उछाल दी, उन्हें अपने जीवन की सफलता का आभास हो रहा है। कहां गया राष्ट्र? राष्ट्रधर्म?
सिर्फ दूसरों पर कीचड़ उछालना, लांछन लगाना, व्यक्तिगत चरित्र हनन करना, भ्रष्टाचार के आरोप लगाना मात्र कर्तव्य रह गया है इन तथाकथित जनप्रतिनिधियों का। क्या आम आदमी यह सब उनसे चाहता है? क्या कभी चुनने के बाद इन जनप्रतिनिधियों ने आम जनता के घर जाकर झांका?
आज जो हाथ जोड़े घर-घर जाकर ‘अपनी कमाई’ के पांच वर्ष की भीख मांग रहे हैं, वहां आम जनता से मिलने का समय मुकर्रर कर नाम की पर्ची मंगवाकर घंटों इंतजार करवाते हैं और दो मिनट मुलाकात कर झूठा आश्वासन देकर अगले आदमी को बुलाकर फिर वही नाटक करके अपने दिन की इतिश्री समझते हैं। कल सुबह फिर वही नाटक जो शुरू करना है, इसलिए रात्रि से पहले आवास के पट बंद कर पहरेदार को ताकीद किया जाता है कि मिलने का समय ‘सुबह इतने बजे से इतने बजे।’
इन्हें क्या मालूम कि दुख और मुसीबत कभी घड़ी में समय देखकर नहीं आते कि कब नेताजी का मिलने का समय निर्धारित है। ये ‘जनप्रतिनिधि’ ‘जन’ के प्रति बेरुख होकर अपनी ‘निधि’ भरने में अधिक रुचि रखते हैं। फिर भी आम आदमी को अपने संवैधानिक अधिकार ‘वोट’ का आभास तो करवाना है और उसे ‘अमूल्य’ का करार देना है। यह वोट उसके अपने लिए नहीं वरन इन नेताओं को पांच वर्ष का लाइसेंस देने के लिए इस्तेमाल करवाना है, ताकि पांच वर्ष तक ये वातानुकूलित घर, कार, टेलीफोन, हवाई यात्रा एवं अन्य सुख-सुविधाओं का उपभोग कर अपनी चुनावी मेहनत का आनंद उठा सकें।
बेसहारा औरतों पर जुल्म, दुराचार, छेड़खानी और यौनशोषण रोकना तो इनकी चुनावी घोषणा में शामिल नहीं होता, तो क्यों इस पचड़े में पड़ा जाए? हमारी संस्कृति किस गर्त में जा रही है, इसका सरोकार नहीं, पर स्वयं के घर में टीवी के २क्क् चैनल लगाना आवश्यक है। देश की प्रगति, भ्रष्टाचार, अत्याचार, गरीबी, अशिक्षा, घूसखोरी, बाल विवाह, अपसंस्कृति, महंगाई, अनगिनत प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों का दानव, आतंकवाद, बेरोजगारी एवं भुखमरी जैसे सवाल अगले पांच साल तक के लिए फिर मुल्तवी। ‘वोट’ दीजिए।
विश्वमोहन भट्ट , संगीतज्ञ