Breaking News 
bhaskar Web English


HomeVichaar Vichaar

जन के बिना कैसा तंत्र?

लोकतंत्र की शास्त्रीय परिभाषा को लेकर कोई अंतर्विरोध या मतभेद नहीं है, लेकिन प्रश्न यह है कि उस परिभाषा को अमल में कितना उतारा गया है। लोकतंत्र का अर्थ है जन की, जन के लिए, जन के द्वारा चलने वाली व्यवस्था जो न्याय, समता, पारदर्शिता और बराबरी के मूल्यों से संचालित हो।

आमतौर पर ऐसा होता नजर नहीं आता, इसलिए लोकतंत्र से लोगों का मोहभंग भी होता है। इस सबके बावजूद भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था हासिल करना भी बहुत बड़ी उपलब्धि है। हमने आजादी की लड़ाई लड़ी और देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम की। पार्टियां, चुनाव और संसदीय राजनीति इस देश में लागू हुई।

पंचायतीराज व्यवस्था लागू हुई। दलितों, महिलाओं और आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष हुए और विजय मिली, लेकिन मसला इतना सपाट और एकरेखीय नहीं है। हमारे देश के लोकतंत्र के इतिहास के कई चेहरे और कई परतें हैं। पिछले 20 सालों में देश की जनता का लोकतंत्र से मोहभंग भी इस व्यवस्था का यथार्थ है। परिभाषा में हम जिन सैद्धांतिक ऊंचाइयों की बात करते हैं, व्यवहार में वे नजर नहीं आतीं।

पार्टियों के दामन पर जाने कितने धब्बे लगे हैं, लोकतंत्र भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। हमारे राजनेताओं और पार्टियों में जनहित में कठोर निर्णय लेने की क्षमता नहीं है। यह पूरी व्यवस्था किनके द्वारा संचालित और किनके हितों की पोषक है, इसे लेकर लोगों के मन में कोई दोराय नहीं। आजादी के बाद इतने सालों में हम दरअसल एक ऐसा मजबूत, धर्मनिरपेक्ष और पारदर्शी लोकतंत्र कायम नहीं कर पाए, जिसके प्रति जनता के मन में अटूट विश्वास हो।

यथार्थ की यह एक तस्वीर है, जिसकी मदद से हमें भविष्य के भारत की रूपरेखा तैयार करनी है। तमाम खामियों के बावजूद लोकतंत्र में हमारा विश्वास है। इसके लिए जरूरी है कि देश की जनता चुनावों की पूरी प्रक्रिया में बराबरी और गहराई से भागीदारी करे, मतदान करे और खुलकर अपने विचार व्यक्त करे। आमतौर पर जनमानस राजनीति को गंदगी और भ्रष्टाचार का ढेर समझकर उससे दूर ही रहना चाहता है। वह यह नहीं समझ पाता कि यह सिस्टम ऐसे ही लोगों से मिलकर बना है और इसे बदलने के लिए भी इसका हिस्सा बनना जरूरी है। वर्तमान राजनीति अगर भ्रष्ट है, तो वैकल्पिक राजनीति भी हमें ही तैयार करनी है।

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक जागरूकता और मतदान के प्रतिशत की गणना की जाए तो ग्रामीण क्षेत्र चुनाव में ज्यादा सक्रिय और सचेत हिस्सेदारी कर रहे हैं। वे अपने गांव, अपनी जमीन और अपने नेता के साथ जुड़ाव महसूस करते हैं, जबकि शहरों में रह रहे लोगों का अपने देश और जमीन के प्रति वैसा जुड़ाव नहीं रह जाता। उनके लिए पूरी दुनिया के रास्ते खुले हुए हैं। वे कभी भी कहीं भी जाकर बस सकते हैं। इस वजह से सिस्टम, पॉलीटिक्स, अपना देश, अपने नेता जैसी बातों में उनकी ज्यादा रुचि नहीं होती।

खास किस्म का असुरक्षित मध्यवर्गीय मानस भी है, जो अपने स्वार्थो के दायरे से बाहर नहीं आ पाता। गरीब और ग्रामीण लोग देश और उसकी अर्थव्यवस्था के साथ तादात्म्य महसूस करते हैं। शहरी मध्य वर्ग को भी समझने की जरूरत है कि इस सिस्टम को बदले और उसे बदलने के लिए संघर्ष किए बगैर उनकी भी मुक्ति नहीं है। अगर उनका सरोकार सिर्फ उनकी निजी आर्थिक तरक्की से है तो वह भी देश की राजनीति में रुचि लिए, चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बने बगैर पूरा नहीं होगा। जब तक आप अपने नेता से सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक निजी सपनों को भी पूरा कर पाना मुश्किल होगा।

चुनाव में हिस्सा लेना और मतदान करना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार भी है और उससे बड़ी यह जिम्मेदारी है। सरकार से अपने अधिकारों की मांग करने से पहले और उन पर प्रश्न खड़े करने से पहले हमें अपनी इस जिम्मेदारी को समझना चाहिए। लोगों को एकजुट होकर आवाज उठाकर यह सुनिश्चित करना होगा कि गलत व्यक्तियों को चुनाव में खड़े होने का मौका न मिले, इस देश की राजनीतिक चुनावी प्रक्रिया ज्यादा से ज्यादा पारदर्शी हो सके। हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं और हमें वे जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। जन न हो तो फिर जनतंत्र किस बात का। यह काम किसी और को नहीं, हमें ही करना होगा। जैसे अक्षर के बिना भाषा नहीं बनती, जन के बिना, जन के संघर्ष के बिना जनतंत्र कैसे बन सकता है?

अरुणा रॉय , सामाजिक कार्यकर्ता





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: