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उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया का भी शुद्धीकरण हो

चुनाव समर की घोषणा होते ही प्रत्येक राजनीतिक दल की पहली अग्नि परीक्षा उम्मीदवारों के चयन से प्रारंभ होती है। उम्मीदवार के चयन के पूर्व दलों की पैंतरेबाजी चलने लगती है। इस ऊहापोह को लेकर कि दूसरा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार घोषित कर दे तो उसके आधार पर अपनी शतरंज बिछाई जाए और विरोधी उम्मीदवार की जाति, वर्ग, संप्रदाय, धर्म आदि का ध्यान रखकर चयन हो।

दुर्भाग्य है कि इस प्रक्रिया ने स्वतंत्रता के बाद देश में जाति व धर्म के नाम पर समरसता को बिगाड़ा है।परिणाम यह है कि जाति व धर्म के नाम पर ही विभिन्न संप्रदायों और वर्गो के नाम पर भी उम्मीदवारों के चयन की मांग उठने लगी है, जबकि उम्मीदवार का चुनाव उसकी उज्‍जवल छवि, क्षेत्र में प्रभाव, सक्रियता, जन सुविधा के कार्य, सहज संबंध, मधुर व्यवहार एवं लोकप्रियता पर आधारित होना चाहिए। परंतु, आर्थिक क्षमता और भुजबल, जातिगत समीकरण और ऊंचे नेताओं तक पहुंच, व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, परिवारवाद एवं पार्टी को नुकसान पहुंचाने की क्षमता आदि जब चयन के आधार बन जाएं तो शीर्ष नेताओं के विरुद्ध जनता का आक्रोश उभरने लगता है।

कई राजाओं, महाराजाओं के सामंती दृष्टिकोण के बावजूद कई प्रमुख दल दलितों व शोषितों पर इन श्रीमंतों के प्रभाव को तरजीह देकर लोकतंत्र को दुर्बल करते हैं। जहां राजनेताओं को अपनी चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतनी चाहिए, वहीं जनता को भी कुछ जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए। कई बार यह मांग उठती रही है कि जनप्रतिनिधि अच्छा काम नहीं कर पाए तो उन्हें वापस बुलाने का अधिकार जनता को हो। यह कई कारणों से अव्यवहारिक लगता हो तो भी नए चुनावों में जनता को यह अवसर मिलता है कि पूर्व जनप्रतिनिधि का मूल्यांकन कर उसे और अवसर दे या नया प्रतिनिधि चुने। लोकतंत्र में न पूर्व प्रतिनिधि का पट्टा होना चाहिए और न ही किसी अन्य का किसी विशेष आधार पर।

पार्टी के लिए प्रतिबद्धता और क्षेत्र में उसकी लोकप्रियता, जनकल्याण के कार्यो को करने-कराने की और अपने नेतृत्व से क्षेत्र में समृद्धि व शांति, व्यवस्था और विकास का कार्य कर पाने की क्षमता ही चयन का आधार होना चाहिए। वह उस क्षेत्र का हो न हो परंतु उस क्षेत्र में उसकी सामान्य स्वीकृति होना तो अपेक्षित ही होता है। यदि राजनेता अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर पारदर्शिता पूर्वक चयन करेंगे और जनता भी हठधर्मिता को छोड़कर लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी पसंद-नापसंद की अभिव्यक्ति करेगी तभी देशहित में नेता और जनता दोनों बहुत कुछ कर पाएंगे और सीखेंगे। हिलेरी क्लिंटन और ओबामा का प्रशंसनीय उदाहरण हमारे सामने है।

कैलाश बिहारी वाजपेयी ,पूर्व प्रशासनिक अधिकारी





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