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भोपाल. माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा ली जाने वाली हाईस्कूल तथा हायर सेकंडरी परीक्षा की कापियों की जांच की गोपनीयता से संबंधित एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया असफल हो गई है। बात हो रही है बार कोड प्रणाली की। जिसे लागू करने में दो बार असफल रहने के बाद मंडल ने इससे तौबा कर ली है।
मंडल ने पिछले साल इंदौर और भोपाल शहर में बार कोड प्रणाली लागू की थी। इस प्रणाली के तहत 10वीं कक्षा के 72 हजार बच्चों की परीक्षा ली गई थी। बताया गया है कि इस दौरान जहां पर्यवेक्षक (परीक्षा ड्यूटी करने वाले शिक्षक) परीक्षा के दौरान ठीक से बार कोड नहीं लगा सके। वहीं कुछ और गड़बड़ी भी सामने आई, जिसके चलते यह प्रक्रिया इस साल लागू नहीं की जा रही है।
हमारी जानकारी
भास्कर की जानकारी बताती है कि परीक्षा कापियों की जांच के दौरान गड़बड़ी करने वाले इस प्रणाली को लागू करने में खासी दिक्कत बन रहे हैं। पिछले साल की परीक्षा की कापियां मूल्यांकन केंद्रों पर र्आई तो उनमें से करीब 15 हजार विद्यार्थियों की कापियों के बार कोड घिसे पाए गए थे। जिससे यह आशंका जताई गई, कि कुछ विद्यार्थियों ने नंबर गलत तरीके से बढ़वाने की गरज से ऐसा किया हो। संकेत यह भी हैं कि नंबर बढ़वाने वाला माफिया इस व्यवस्था को लागू होने देना नहीं चाह रहा। हालांकि मंडल के अधिकारी ऐसे किसी माफिया की बात से इंकार करते हैं।
मंडल का कहना
बार कोड के चलते पुनर्गणना की प्रक्रिया में भारी दिक्कत आती है। क्योंकि कोड होने के कारण विद्यार्थी का मूल रोल नंबर मिलना आसान नहीं होता है। जिससे पुनर्गणना का रिजल्ट समय पर देना संभव नहीं रह जाता। इसलिए यह प्रणाली नहीं अपनाई जा रही है।
क्या है बारकोड प्रणाली
उत्तर पुस्तिका के मुख्य पृष्ठ पर बार कोड लगा दिया जाता है, जिससे विद्यार्थी का रोल नंबर कोड वर्ड में हो जाता है। जिसका मूल रोल नंबर से मिलान केवल कंप्यूटर कर सकता है। यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके जरिए गलत तरीके से नंबर बढ़वाने वाले विद्यार्थियों को हतोत्साहित किया जा सके।
बार कोड की कापियों की जांच करने तथा पुनर्गणना में मंडल के स्टाफ को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही कुछ और तकनीकी परेशानियां भी हैं जिनके चलते इस व्यवस्था को लागू नहीं किया जा रहा है। वैसे भी यह व्यवस्था उन राज्यों के लिए है, जहां विद्यार्थियों की कापी उसी जिले में जांची जाती है। -कवीन्द्र कियावत सचिव माध्यमिक शिक्षा मंडल