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यदि प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह या कांग्रेस-आधारित यूपीए में सचमुच कोई सख्ती की इच्छा होती तो ऊपर से नीचे तक परिवर्तन दिखाई देता। गृहमंत्री शिवराज पाटिल और मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का जाना तो तय ही था, रक्षा मंत्री एके एंटोनी को क्यों बचा लिया?
मार्च-07 में लोकसभा में और हमले के दो दिन पहले कोच्चि की एक सभा में उन्होंने चिंता जाहिर की थी कि सीमा तो सुरक्षित है, समुद्री सीमा से आतंकी आ सकते हैं। यदि एंटोनी को इतना पता था तो उन्होंने सुरक्षा प्रबंध क्यों नहीं बढ़ाए? पाटिल और एंटोनी में फर्क क्या है? यही नहीं, विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी को ही बने रहने का कौनसा अधिकार है?
हमारी कूटनीति पाकिस्तान और चीन को ही तो ध्यान में रखकर बनी है। दो साल के कार्यकाल में मुखर्जी पाक के प्रति हमेशा नरम क्यों दिखे?पहली बार लोगों का नेताओं-मंत्रियों पर गुस्सा भयंकर रूप से निकल रहा है लेकिन सरकार का एक पूरा तंत्र अभी भी जनाक्रोश से पूरी तरह बचा हुआ है। वो है आला अफसरों का तंत्र। राष्ट्र जानना चाहता है कि इतने धमाकों के बाद केंद्रीय गृह सचिव ने आखिर किया क्या? रक्षा सचिव ने समुद्री तटों की अपने मंत्री की चिंता पर क्या कार्रवाई की? विदेश सचिव ने सीमा-पार आतंकवाद पर पाक से बात कर क्या नतीजा निकाला? इनका उत्तर एक ही है- कुछ भी नहीं।
इनसे भी गंभीर मसला है समुद्री सीमा की प्रहरी एजेंसियों का। देश की 7000 किमी लंबी समुद्री सीमा की सुरक्षा तीन तंत्रों- नौसेना, कोस्ट गार्ड और कस्टम के जिम्मे है। इनमें से एक का भी प्रमुख अति सतर्क होता तो, तो 1993 के मुंबई धमाकों का कारण बने विस्फोटकों का मार्ग फिर से आतंकियों के लिए आसान न होता।
यदि कराची से विदेशी रजिस्ट्रेशन वाले व्यापारिक जहाज में मौत का सामान नौसेना सख्ती से जांच लेती तो वहीं आतंकी पकड़े जाते। यानी हिन्दुस्तान की सीमा से काफी पहले। नौसेना कह सकती है कि ऐसा तब संभव था जब खुफिया तंत्र उसे कुछ सतर्क करता। किन्तु वो भी तो नौसेनाध्यक्ष के नेतृत्व में ही काम करता है।
इसी तरह कोस्टगार्ड प्रमुख भी घेरे में हैं। समूचा कोस्ट गार्ड अमला क्यों आंखें मींचे बैठा रहा जब भारतीय जहाज में स्वच्छंद विचरण करते दस हमलावर घुस आए? समुद्री सीमा से एक निश्चित क्षेत्र (कोई 12 समुद्री मील में फैला) कोस्ट गार्ड के भरोसे है। दिन-रात गश्त होती है। तो इतने लोग, इतना विस्फोटक कैसे आ गया? इसके बाद हमलावर किनारे आ गए तो समुद्री सीमा पर तैनात मुंबई पुलिस ने उन्हें क्यों नहीं देखा? क्या नौसेनाध्यक्ष अपने आप को इस हमले का जिम्मेदार नहीं मानते? क्या कोस्ट गार्ड के महानिदेशक आरोप से बचकर सहज ही सेवानिवृत्त हो सकते हैं?
विदेशी मामलों की खुफिया एजेंसी रॉ के प्रमुख अब तक बने हुए क्यों हैं? आंतरिक गुप्तचर एजेंसी आईबी प्रमुख का इस्तीफा क्यों नहीं आया? ये प्रश्न खुले पड़े हैं।
इनके कारण अलग से खोजने जाने की जरूरत नहीं है। समूची सरकार ही ऐसे रूटलेस वंडर्स यानी आधारहीन अजूबों की बंधक बनी हुई है। जबकि मंत्री तो आज हैं, कल पाटिल हो जाएंगे। अफसर कल उत्तराखंड के मुख्य सचिव थे, आज केंद्रीय गृह सचिव हैं, कल किसी हादसे की जांच के लिए आयोग के जरिए सत्ता में बने रहेंगे।
इन अफसरों के बारे में इसलिए भी सोचना होगा क्योंकि इनके एक बयान से देशों के संबंध बन-बिगड़ सकते हैं। इनके एक हस्ताक्षर से वारे-न्यारे हो सकते हैं। जबकि इनके कारनामों की कहानी कभी किसी के सामने नहीं आती। कारगिल पर सुब्रमण्यम रिपोर्ट में इनके बारे में न जाने क्या-क्या है? आतंकियों से उगलवाए राज पर 1996 में बनी एक आईबी रिपोर्ट में समुद्री रास्ते पर बिछे नापाक इरादों का वर्णन इनकी नाकामी का दस्तावेज ही तो है। तिस पर ये जवाबदेह नहीं हैं। खुद इनके मंत्री इनसे, इनके व्यक्तित्व और भाषा से डरते-बचते हैं। इन तक कोई पहुंच ही नहीं पाता- फिर भी इतनी ‘साख’ सर्वोच्च होती है। हालांकि कोई नहीं जानता- ये करते क्या हैं?
यही समय है, जब नया हिन्दुस्तान बन रहा है, तब इन सभी से मुक्ति पाई जाए। प्रधानमंत्री हों या विपक्ष के नेता- सभी सहमे हुए हैं। आज इन अजूबों से मुक्ति नहीं ली- तो ये जीवाश्म बन जाएंगे। कभी खत्म नहीं होंगे।