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मानवीय त्रासदी : कैसे करें आकलन

परदे के पीछे. धरती की अंतड़ियों में दर्द उठता है जिसे हम भूकंप कहते हैं। विज्ञान की खोज रिएक्टर स्केल पर भूंकप की तीव्रता आंकी जाती है। वर्षा को मापने का यंत्र है, ऊंचाई, गहराई, लंबाई-चौड़ाई सबके लिए इंच टेप इत्यादि हैं परंतु मानवीय त्रासदी के व्यापक प्रभाव को नापने के लिए कोई यंत्र नहीं है।

शैलेंद्र ने प्रयास किया था ‘पलक पर आंसुओं को तोलतीं, वह तुम न थीं तो कौन था,’। मुंबई त्रासदी में मृत लोगों की संख्या या घायलों की तादाद से त्रासदी का अनुमान नहीं लगता। मानवीय त्रासदी की तुलना भी उसी तरह की अन्य घटनाओं से नहीं की जा सकती। यह कौन बता सकता है कि संसद पर हमला या मुंबई की घटना में कौन ज्यादा बड़ी या शर्मनाक है। दर्द, भय और नपुंसक क्रोध की लहरें मुंबई की सरहद के पार पूरे देश को प्लावित कर कर रही हैं। सत्ता के गलियारे खामोश हैं तो विरोध क्या करें, उसके अपने दामन पर कई दाग हैं।

त्रासदी के प्रभाव की व्यापकता का अंदाज इस बात से लगता है कि बुरहानपुर के मैक्रोविजन स्कूल के छात्रावास में रहने वाले बच्चे इतने सहम गए हैं कि मनोवैज्ञानिक चिकित्सा की आवश्यकता है। कुछ इसी तरह का प्रभाव अनेक शहरों के बच्चों पर पड़ा है जिन्होंने टेलीविजन पर संहार के दृश्य देखे हैं। अब मासूम बचपन की पटकथा में नया अध्याय जुड़ गया है। उनके मन में उपजे अनुत्तरित प्रश्न शिक्षकों और पालकों का हृदय मथ रहे हैं।

सत्तासीन लोगों से लेकर फकीरों तक के पास जवाब नहीं है। ये कौन कर रहा है? क्यों कर रहा है? विपुल धन और साधन उन्हें कहां से मिल रहे हैं? हम अपने सुरक्षा संयंत्र को मजबूत करने के लिए धन कहां से लाएं, राष्ट्रीय धन का बड़ा भाग सरकार चलाने पर खर्च होता है जो प्रगति नहीं करते हुए केवल प्रगति को रोकती है। इसी तरह विरोध की ऊर्जा और धन का अपव्यय भी नारेबाजी और स्वांग करने में हो रहा है।

कितने शर्म की बात है कि सुबह नौ से शाम पांच बजे तक हथेलियों पर खैनी मलने वालों का वेतन बढ़ता रहता है परंतु जाबाज सैनिकों का नहीं बढ़ता क्योंकि वे किसी विध्वंसक संगठन में शामिल नहीं हैं। ये कैसे हालात हैं कि माफियानुमा संगठन में शामिल हुए बिना न्याय नहीं मिलता। यह भी समझना कठिन है कि केवल राष्ट्रीय संकट की घड़ी में अवाम एकजुटता में बंध जाता है और सामान्य क्षणों में हम अपने पैदाइशी टुच्चेपन पर लौट आते हैं।

हम केवल प्रत्यंचा पर चढ़े रहने की स्थिति में जीवंत रहते हैं और तरकस में मृत की तरह पड़े रहते हैं। विगत कुछ वर्षो में हमने भ्रष्टाचार को जीवन के अभिन्न अंग की तरह स्वीकार कर लिया है और अब वह राष्ट्र को हानि पहुंचाने वाली सूची में काफी नीचे खिसक गया है। हम क्यों यह अनदेखा करते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा भ्रष्टाचार के कारण भी खतरे में आती है। रिश्वत खाकर खरीदे बुलेट जैकेट के कारण कई सिपाही शहीद हुए। सन् 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट में भ्रष्ट भारतीय लोगों के कारण ही इतनी मात्रा में विस्फोटक देश में लाए गए और ये भ्रष्ट लोग सभी धर्मो के थे। इस पूरे हादसे से धर्म को हटाकर सोचिए। इस बार भी हथियार समुद्र के रास्ते आए हैं और कहीं न कहीं गफलत हुई है। नरीमन हाउस का सुरक्षाकर्मी एन वक्त पर कहीं चला गया था?

सुरक्षा की खातिर ही सही भ्रष्टाचार को अहम मुद्दा माना जाना चाहिए। केवल जागरूक आम आदमी ही भ्रष्टाचार से टकरा सकता है। हर भ्रष्ट आदमी कहता है कि वह परिवार के भविष्य के लिए रिश्वत खाता है और अगर परिवार का सदस्य ही विरोध करे तो क्या बात बन सकती है?





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