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हर मां की तमन्ना बेटा हो फौज में

देवास. एक गांव ऐसा भी है जहां हर दिल में मातृभक्ति व जेहन में दुश्मन को नेस्तनाबूद करने का जज्बा हिलोरे मार रहा है। देवास-शाजापुर जिले की सीमा के निकट उज्जैन जिले के कनासिया गांव में हर तीसरे घर का सपूत सेना में है, भले ही वह एकलौता ही हो।

8265 की आबादी वाले गांव में करीब 500 नौजवान फौजी हैं। थलसेना ही नहीं सीआरपीएफ, सीआईएसएफ, बीएसएफ, असम रायफल्स व पुलिस विभाग में करीब 100 नौजवान सेवा दे रहे हैं। देशभर में जहां भी सेना में भर्ती होती है कनासिया के नौजवान मौजूद रहते हैं। 10 नौजवान कम्बोडिया, लेबनान, कांगो, सोमालिया व श्रीलंका भेजी गई शांति सेना में शामिल हुए। सबसे पहले 1945 में गांव में देशभक्ति का रंग चढ़ा जो लगातार गहरा होता गया।

पहले फौजी रणछोड़लाल देथलिया ने 1948 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध में शामिल होकर दुश्मनों के दांत खट्टे किए थे। वैसे 1942 के द्वितीय विश्व युद्ध में रघुनाथ कुंभकार शामिल हो चुके हैं। पूर्व फौजी प्रभुलाल खाती ने बताया 1971 भारत-पाक युद्ध के दौरान वे छुट्टी पर घर आए थे लेकिन दूसरे ही दिन री-काल आ गया। 25 दिन तक युद्ध में शामिल रहे।

होड़ है फौज में जाने की: वरिष्ठ व्यायाम शिक्षक प्रहलादसिंह देथलिया ने बताया 80 प्रतिशत किसान पुत्र हैं। नौजवानों में अनुशासन व स्पोर्ट्स के प्रति लगन है। फौज में जाने की होड़ व फिटनेस के कारण अधिकांश घरों में सेना की वर्दी टंगी है। 15 साल की उम्र होने पर प्रत्येक किशोर सेना में जाने की ठान लेता है। जगदीश देथलिया ने कहा उनके भाई मदनलाल, विष्णु, गणोश, प्रेमनारायण थल सेना में व अजरुन बीएसएफ में हैं।

पूरा परिवार देश की रक्षा में: कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिनका पूरा परिवार ही फौज में है। स्व. मोहनलाल देथलिया फौजी थे। उनके दो पुत्र गौरीशंकर, धन्नालाल भी सेना में हैं। उनकी एक पुत्री संगीता शाजापुर में हेड कांस्टेबल है।

10 बेटे होते तो उन्हें देश पर कुर्बान होने भेजती: सेना में गए एकलौते पुत्र सोहन देथलिया की मां कुंताबाई मुंबई धमाकों से व्यथित है। वह गर्व से कहती है यदि मेरे 10 पुत्र भी होते तो मातृभूमि की रक्षा के लिए फौज में भेजती। खेती-बाड़ी है फिर भी बेटे को खुशी-खुशी भेजा है। इस गांव पर नाज है, यहां का हर बेटा फौजी बनना चाहता है।

एक करोड़ से अधिक वेतन: महिला एवं बाल विकास परियोजना अधिकारी देवास शहर जीवन देथलिया ने बताया यहां कई नौजवान सेना, पुलिस, सीआरएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, असम रायफल्स, शिक्षक, डॉक्टर, व्याख्याता हैं। यहां के युवाओं को प्रतिमाह अनुमानित एक करोड़ से ज्यादा वेतन मिलता है।

कनाड़ा के लोगों ने किया अध्ययन: गांव के नंदकिशोर पटेल व सरपंच बाबूलाल देथलिया ने कहा 1994 में कनाड़ा से 14 लोग गांव की संस्कृति का अध्ययन करने आए थे। इस दौरान ग्रामीणों व उनके सहयोग से मांगलिक भवन बनाया गया था। उन्होंने कहा देशप्रेम, अत्यधिक उत्साह, फिटनेस व स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के कारण यहां के ज्यादातर नौजवान फौजी हैं।





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