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संपादकीय. मुंबई में देश के सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद समूचे राष्ट्र में रोष की लहर का पैदा होना उतना अप्रत्याशित नहीं है, जितना उसकी गहराई और व्यापकता है। अखबारों, जिनमें आपका यह अखबार दैनिक भास्कर भी है, और टेलीविजन न्यूज चैनलों पर गुस्से और आक्रोश से भरे संदेशों की बाढ़ आ गई है। इसके अलावा कुछ निश्चित घटनाएं घटी हैं, जो राष्ट्र में इस वक्त व्याप्त भावनाओं की प्रतिनिधि घटनाएं बन गई हैं।
मुंबई आतंकी हमले में शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने गहरे क्षोभ और वितृष्णा के साथ जिस तरह केरल के मुख्यमंत्री से मिलने से इनकार किया, उसके पीछे अपने इकलौते बेटे को खोने का शोक भर नहीं था, बल्कि वह राजनेताओं के प्रति जनमानस के मन में उभर रहे क्रोध की ही निजी और घनीभूत अभिव्यक्ति थी। इसी तरह मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस नेता संजय निरुपम को क्रुद्ध नागरिकों की भीड़ ने घेरकर अपनी नाराजगी जताई। हमले में शहीद आतंकवाद निरोधक दस्ते के प्रमुख हेमंत करकरे का परिवार गुजरात के मुख्यमंत्री द्वारा घोषित सहायता राशि ठुकरा ही चुका है।
सवाल यह है कि क्या भारत राष्ट्र जनमानस में व्याप्त इस रोष, क्रोध, आक्रोश और शोक की भावना को सकारात्मक ऊर्जा में बदल सकता है। इसी प्रश्न में इस समय देश के सामने उपस्थित परीक्षा और चुनौती निहित है। लोगों के आक्रोश का केंद्र सबसे ज्यादा देश के राजनेता हैं, लेकिन उनके बगैर न देश चल सकता है और न लोकतंत्र। इसलिए सवाल यह होना चाहिए कि हम देश के नागरिक ऐसा क्या कर सकते हैं जिससे अपने राजनेताओं को जिम्मेदार बना सकें?
ऐसे विचार और उपाय सामने आएं तो इससे निश्चय ही लोकतंत्र और मजबूत होगा। दूसरे, मुंबई की घटना के पीछे तंत्र की विफलता है जो लोगों के आक्रोश से झांक रही है। सवाल यह है कि हमें तंत्र और नीतियों में कौन-से बदलाव करना चाहिए जिनसे ऐसी घटनाएं आगे न घटें? इस वक्त देश का जनमानस तंत्र की कमियों और उन्हें दूर करने के तरीके सामने रख सकें तो वह आक्रोश की सकारात्मक अभिव्यक्ति होगी। यह देश के बौद्धिक नेतृत्व की भी परीक्षा का समय है क्योंकि राष्ट्रीय क्षोभ को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है।