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नई दिल्ली. आतंकी हमले की जवाबदेही ने पूर्व गृह मंत्री शिवराज पाटिल की कुर्सी तो ले ली लेकिन इसके साथ ही देश की अर्थव्यवस्था की कमान के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बोझ कुछ और बढ़ा दिया है।
वित्त मंत्रालय को संभाल रहे पी. चिदंबरम को कामयाब पारी खेलने के इनाम में गृह मंत्री बना दिया गया और मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्रालय की कमान खुद संभाल ली। जिस तरह सोमवार को मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्रालय का जिम्मा संभालते हुए अधिकारियों की बैठक ली, उससे लगता है कि वह शायद नये काम को लेकर काफी संजीदा हैं। वैसे सोमवार सुबह शेयर बाजार ने 200 अंकों की उछाल के साथ उनका स्वागत भी किया लेकिन शाम को बाजार का 252 अंकों की गिरावट के साथ बंद होने के मायने क्या हैं कहना मुश्किल है।
यह कुछ उसी तरह की पहेली है जैसी चिदंबरम की वित्त मंत्रालय से निकलकर गृह मंत्रालय संभालने पर कारपोरेट जगत द्वारा स्वागत किये जाने में है। असल में शिवराज पाटिल गृह मंत्री के रूप में जितने ढीले प्रशासक साबित हुए हैं चिदंबरम वित्त मंत्री के रूप में उतने ही कामयाब प्रशासक साबित हुए हैं। इसी के मद्देनजर चुनाव के नजदीक और आतंकवाद के खिलाफ कमजोर सरकार के रूप में आलोचना झेल रही मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने गृह मंत्री के रूप में चिदंबरम का चुनाव किया है।
वहीं इस घटनाक्रम के बाद मनमोहन सिंह के खाते में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, कोयला मंत्रालय, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और एटोमिक इनर्जी मंत्रालय के बाद अब वित्त मंत्रालय भी जुड़ गया। वैसे तो पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने खुद सोमवार को इस मंत्रालय से विदाई के वक्त कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और रिजर्व बैंक गर्वनर सहित अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के सभी महत्वपूर्ण पदों का अनुभव है।
ऐसे में मौजूदा माहौल में वित्त मंत्रालय का कामकाज देखने के लिए उनसे बेहतर दूसरा व्यक्ति कौन हो सकता है। चिदंबरम की बात एकदम सटीक है लेकिन एक-एक फाइल को करीब से देखकर टीका-टिप्पणी करने वाले वित्त मंत्री के बाद इस मंत्रालय के अधिकारी जरूर कुछ राहत महसूस करेंगे क्योंकि इस मंत्रालय का जिम्मा खुद प्रधानमंत्री संभालें या फिर कोई दूसरा मंत्री चिदंबरम जैसी मुस्तैदी शायद ही दिखाई पड़े।
लेकिन इसके साथ ही चिदंबरम का अतिआत्मविश्वासी होना राजनीतिक रूप से उनके लिए बहुत बेहतर भी नहीं रहा। मौजूदा वित्तीय संकट के दौर में घरेलू अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाये रखने के लिए राजनीतिक आम सहमति बनाने के रास्ते में उनकी छवि आड़े आती रही है। पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने हाल ही में बिजनेस भास्कर के साथ के साथ एक बातचीत में इसी तरह का आरोप भी लगाया था। ऐसे में वित्त मंत्रालय से (नार्थ ब्लाक से नहीं क्योंकि गृह मंत्रालय भी नार्थ ब्लाक में ही है) उनकी विदाई अर्थव्यवस्था पर बड़े फैसलों में राजनीतिक आम सहमति के कुछ रास्ते खोल सकती है।
उनके अपने कैबिनेट सहयोगी वाणिज्य मंत्री कमलनाथ के साथ भी कई मामलों में उनकी नोकझोंक होती रही है। प्रधानमंत्री के लिए गठबंधन सरकार में ऐसा वित्त मंत्री दिक्कत पैदा करने वाला साबित हो सकता है। इसलिए कहीं न कहीं मनमोहन सिंह को इस मोर्चे पर भी कुछ राहत भी मिल सकेगी। पर चिदंबरम के लिए गृह मंत्रालय की पारी उतनी कामयाब रहेगी, जितनी कि वित्त मंत्रालय की रही है कहना मुश्किल है। यहां उन्हें आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने के लिए देश के तमाम राज्यों की सरकारों के साथ तालमेल बैठाने के लिए समायोजन में माहिर की छवि तैयार करनी होगी। जो अभी तक उनकी नहीं रही है।