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जयपुर. मुंबई की घटना के बाद राजनेताओं की प्रतिक्रिया ने ना केवल देश की सुरक्षा की पोल खोल दी बल्कि इन नेताओं की कथनी और करनी के फर्क को भी स्पष्ट कर दिया। यही वजह है कि इस घटना को लेकर इन नेताओं के प्रति जितना आक्रोश आम जन में उतना ही गुस्सा उन सपूतों के परिवारों में भी देखने को मिला जो अपने जिगर के टुकड़ों को देश के लिए खो चुके हैं।
लोगों का तो यहां तक कहना है कि नेता शहीद की कीमत लगा कर इतिश्री करना चाहते हैं। शहीद परिवारों का कहना है कि दरअसल सिस्टम में सुधार की जरूरत है। जिससे कोई भी बहादुर सिपाही अपनी जान किसी सियासी खेल की वजह से ना खोए।
नेताओं के खिलाफ गुस्सा अब चरम पर
मुंबई की घटना का आंखों देखा हाल मैं तीन दिन एक टक देखती रही और हर मौत की खबर मुझे अंदर से झकझोर देती थी। यह कहना है शहीद भानु प्रताप सिंह की मां पदमा राठौड़ का जो नम आंखों से बताती हैं कि मैंने अपने जिगर के टुकड़े को खोया है और हर मरने वाला किसी ना किसी का बेटा था। मगर दुख इस बात पर होता है जब सुनने में आता है कि इनकी शहादत को भी राजनीति करने का माध्यम बना लिया है। शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता का मुख्यमंत्री को घर से निकालने की घटना वाकई उन नेताओं के लिए सबक है जो केवल औपचारिकता निभाने शहीदों के घर जाते हैं। मेजर संदीप के पिता का आक्रोश बिल्कुल सही है और यह एक तरह से चेतावनी भी है कि नेताओं के खिलाफ लोगों का आक्रोश बढ़ रहा है।
रिश्वत नहीं देनी मुझे
सन 2002 में नॉर्थ ईस्ट फ्रंटीयर पर शहीद हुए फ्लाइट ले. अभिमन्यु सिंह के पिता धर्मवीर सिंह कहते हैं, उनके बेटे के शहीद होने पर पैट्रोल पंप के लिए आवेदन मांगे थे। मैंने भी आवेदन किया था। कुछ दिन बाद लैटर आया। उसमें लिखा था कि अगले कुछ दिनों में वे अलॉट कर देंगे, लेकिन आज 6 साल बाद भी कुछ नहीं हुआ।
शायद ये इसी का परिणाम है कि मैं अपने शहीद बेटे की कुर्बानी के नाम पर रिश्वत नहीं देना चाहता। हर जगह वोटों की राजनीति पैर पसार चुकी है। चाहे ये राजनीति एक आम नागरिक पर हो या फिर शहीदों की शहादत पर। इन वोट बैंक के सौदागरों पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वे कहते हैं, ऐसा क्यों हो गया है कि नेता अपना कर्तव्य भूलकर सिर्फ अपने स्वार्थ पर ही ध्यान देते हैं। क्या उन्हें इसी लिए सीट पर बैठाया गया है कि वे वहां बैठकर जनता के दुख दर्द छोड़कर अपने लिए सोचते रहें।
शहीद हुए कंमाडो संदीप उन्नीकृष्णन के पिता के रोष के बारे में कहते हैं कि यदि मैं उनकी जगह होता तो शायद इतना नहीं कर पाता। लेकिन फिर भी उनका गुस्सा लाजमी था। वो नेता उन्हें दिलासा या सम्मान देने नहीं गए थे। वे तो सिर्फ एक दबाव के चलते अपनी फॉर्मेलिटी पूरी करने गए थे।
यंग फोर्स सबसे आगे
पिछले दिनों हुए आतंकवादी हमलों का असर न केवल मुम्बई पर हुआ है बल्कि पूरा देश इससे विचलित है। जयपुर में भी यूथ का विरोध प्रदर्शन जारी है। जहां एक ओर रविवार को मोटरसाइकिल रैली निकाली वहीं सोमवार को यूथ ने अपना विरोध प्रदर्शन आतंकवादियों के खिलाफ नारे लगाकर जताया।
हर नेता अपना बेटा भेजे आर्मी में
देश के संविधान में एक और चीज जुड़नी चाहिए। कोई भी कुर्सी पर तभी बैठ सकेगा जब उसका बेटा फौज या किसी सुरक्षा एजेंसी में भर्ती हो। निधि सिंह, पूजा, करिश्मा, रेखा, राजेश और शिवी कहते हैं, यदि ऐसा हो जाए तो देश अपने आप सुरक्षित हो जाएगा। जब खुद पर बीतेगी तो अपने आप सारी कवायद शुरू हो जाएगी।
देश की सोचो कुर्सी सलामत रहेगी
स्टूडेंट शीतल, पवन,सौम्या और नेहा के अनुसार यदि देश के राजनेता अपनी कुर्सी की चिंता छोड़कर देश की सोचें तो कुर्सी अपने आप ही बच जाएगी। वे ऐसा कर ही नहीं सकते, क्योंकि उनके लिए आम आदमी की कोई अहमियत नहीं है। ऐसा नेताओं को तो कुर्सी से उतार देना चाहिए।
किसी राजनेता के बेटे ने क्यों नहीं दी अब तक शहादत
मुंबई शहर 60 घंटे जिस तरह त्रासदी से गुजरा है यह दुखद नजारा विश्व ने देखा है। आतंकवाद की इस घिनौनी हरकत पर पूरे विश्व के नेताओं ने रोष प्रकट किया है। इस आतंकवादी कार्रवाई में बंधक बनाए लोगों को छुड़ाने के लिए सशस्त्र सेना और एनएसजी के कई अफसर और जवान शहीद हो गए।
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के अंतिम संस्कार के समय किसी राजनेता का न होना हमारे नेताओं की सोच को दर्शाने के लिए काफी है। शर्मनाक तो यह है कि मेजर उन्नीकृष्णन का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ भी नहीं किया गया है। ऐसा होना किसी भी प्रजातांत्रिक देश के लिए काला अध्याय ही है। शहीद मेजर आलोक माथुर के पिता रिटायर्ड कैप्टन आर एस माथुर कहते हैं, किसी भी नेता के बेटे ने देश के 60 वर्ष के इतिहास में शहादत नहीं दी है।
यही कारण है कि वे शहीद के पिता के दुख को समझ नहीं सकते। वे कहते हैं मैं नेताओं की इस असंवेदनशीलता और लापरवाही का हृदय से विरोध करता हूं। कैप्टन माथुर कहते हैं, अखबार के जरिए में मेजर संदीप के परिजनों के दुख को बांटना चाहता हूं। और कहना चाहता हूं कि मैं उनके हर दुख-दर्द में उनके साथ हूं।