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भोपाल. चौबीस सालों में गैस पीड़ितों को मुआवजे के नाम पर कुछ रकम जरूर हाथ लगी, पर वह स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलीं, जिसकी उसे दरकार थी। तमाम बीमारियों का शिकार होने के कारण गैस पीड़ितों की श्रम करने की शक्ति भी घटी है। वैसे ये लोग गैस रिसन के भयावह मंजर को भुला देना चाहते हैं। ये न तो अब वारेन एंडरसन के पुतले जलाने वालों की भीड़ में शामिल होते हैं और न शोक सभाओं में जाते हैं।
यूका के सामने स्थित जयप्रकाश नगर जैसी गैस पीड़ित बस्ती में गैस त्रासदी की 24वीं बरसी पर सोमवार को लगभग सब कुछ सामान्य ही दिखा। काम पर गए लोगों को छोड़कर बाकी लोगों में कोई टीवी देख रहा था, कोई कपड़े धो रहा था, तो कोई बिस्तरों को धूप दिखा रहा था। अनेक बच्चे यहां के स्कूल मैदान में क्रिकेट खेल रहे थे।
एक दशक पहले दिखता था गुस्सा
एक दशक पहले तक गैस पीड़ितों और उनके संगठनों में इतना अधिक गुस्सा था कि वे हजारों की संख्या में यूका के समक्ष एकत्र होकर प्रदर्शन और सभाएं करने के साथ ही एंडरसन के दर्जनों पुतले फूंकते थे। कई दफा तो प्रदर्शनकारियों के बेकाबू होने पर पुलिस को उन पर लाठियां तक बरसाना पड़ी थीं।
कमी आई प्रदर्शनों में
यूनियन कार्बाइड के सामने प्रदर्शनों की संख्या में कमी का आना वर्ष 1988-89 से शुरू हुआ, जब गैस पीड़ितों को अंतरिम राहत बंटनी शुरू हुई। लोगों के हाथ कुछ पैसा लगा। इसके बाद के सालों से यूका के सामने हर बरसी पर इकट्ठी होने वाली भीड़ कम होती गई। गई संगठन भी नदारद हो गए। लगा जैसे लोग भूलने लगे हैं कि कभी मिक ने उनसे उनका बहुत कुछ छीना था।
होंगे कई कार्यक्रम
भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ, महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा और ग्रुप फार इंफरमेशन एंड एक्शन द्वारा दो तथा तीन दिसंबर को विभिन्न कार्यक्रम के जरिए गैस पीड़ितों की दशा उजागर की जाएगी। इसके तहत मशाल जुलूस, श्रद्घांजलि और पुतला दहन जैसे कार्यक्रम रखे गए हैं। गैस पीड़ितों की मांगों को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए संगठन बच्चों की मदद भी लेंगे।
अब न्यायालय से आस
गैस पीड़ित बस्तियों में पिछले एक दशक से गैस त्रासदी की बरसी के समय भी अधिकांश सब कुछ सामान्य दिखाई देता है। इसके पीछे वजह लोगों के जीवन स्तर में लगातार आया सुधार है। यह और बात है कि वे आज भी कई बीमारियों की गिरफ्त में हैं। लोगों का कहना है कि वे सरकार से उम्मीद छोड़ चुके हैं। केवल न्यायालय से ही न्याय की आस बाकी है। कारण यह है कि न तो गैस पीड़ित बस्तियों में पर्यावरण सुधार की दिशा में कोई ठोस काम हुआ है और न अस्पतालों में गैस पीड़ितों का ठीक से इलाज होता है। गैस पीड़ितों के लिए खोले गए कई पाली क्लीनिक भी बंद हो चुके हैं।
संघर्ष की भी होती है सीमा
जयप्रकाश नगर के भोलाशंकर सेन से जब पूछा गया कि अब यहां के काफी कम लोग त्रासदी की बरसी पर प्रदर्शनों में दिखते हैं, तो उनका कहना था कि संघर्ष की भी एक सीमा होती है। इतने साल बाद भी क्या मिला। थोड़े से रुपए, दवाएं। इसके अलावा अन्य स्वास्थ्य सेवाएं ढंग से आज भी नहीं मिल रहीं हैं। ऐसी ही कुछ बातें चम्पालाल बाथम ने भी कहीं। इस सब के बीच सैकड़ों ऐसे लोग भी हैं, जो उस भयावह काली रात को कभी नहीं भुला सकेंगे, जिन्होंने उस रात अपनों को खोया है।
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