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भोपाल. गैस पीड़ित अपने शरीर के विभिन्न परीक्षणों और दवाइयों के दोहराव से परेशान हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी गैस राहत अस्पतालों की इंटरलिंकिंग (आपस में जुड़ना) नहीं की गई है। मरीजों का बीमारी संबंधित कोई रिकॉर्ड विभाग और अस्पतालों के पास नहीं है। पुराने रिकॉर्ड के अभाव में न केवल मरीज को एक ही टेस्ट कई बार कराना पड़ जाता है, बल्कि समान दवाइयां भी दोबारा दे दी जाती हैं।
वर्ष 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग के सभी अस्पतालों को कंप्यूटराइज करने और उनकी इंटरलिंकिंग के आदेश दिए थे। विभाग ने आदेश पर अमल के लिए कई बार समय-सीमा बढ़वाई, लेकिन सात साल बाद भी आदेश का पालन नहीं हुआ।
कंप्यूटर से बन रहे सिर्फ पर्चे
आधुनिकीकरण के नाम पर गैस राहत अस्पतालों की ओपीडी का कुछ माह पूर्व कंप्यूटराइजेशन किया गया। इससे अस्पतालों में रखे कंप्यूटरों से सिर्फ मरीजों के पर्चे बनाए जा रहे हैं। पर्चे पर दवाइयां भी हाथ से लिखी जाती हैं, जिनका कोई रिकॉर्ड कंप्यूटर में नहीं रखा जाता।
ऐसे में अगली बार अस्पताल आने पर मरीज को संदर्भ के रूप में वही पर्चा दिखाना पड़ता है। अगर किसी कारणवश मरीज को अस्पताल बदलना पड़े, तो डॉक्टर के सामने स्वयं अपनी पूरी केस हिस्ट्री रखने के अलावा मरीज के पास कोई और चारा नहीं बचता। इंटरलिंकिंग के अभाव में वर्तमान व्यवस्था इन सभी उद्देश्यों को पूरा करने में असफल है।
गैस राहत अस्पतालों की इंटरलिंकिंग का प्रस्ताव राज्य सरकार के पास भेजा गया है। फिलहाल चुनाव आचार संहिता के चलते इस पर काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
—डॉ. डीपी अग्रवाल, सीएमओ, गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग