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भोपाल. गैस त्रासदी का दंश झेल रही राजधानी में 24 साल पहले की घटना को वैज्ञानिक हिरोशिमा-नागासाकी के परमाणु विस्फोट के बराबर ही मान रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल की रिसर्च विंग द्वारा गैस पीड़ितों और उनकी पीढ़ियों से अधिक पर की गई रिसर्च में यह बात स्पष्ट हो रही है।
गैस त्रासदी झेल चुके लोगों के गुणसूत्र अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि मिथाइल आइसो साइनाइड (एमआईसी) गैस से आने वाली नस्लों में मानव के लिए आवश्यक 46 में से 45 ही गुणसूत्र बचे हैं।
रिसर्च के अनुसार कुल गैस पीड़ितों में से लगभग एक तिहाई लोगों की मृत्यु का कारण कैंसर रहा है। कैंसर अस्पताल के रिसर्च टीम के वैज्ञानिक डॉ. एन गणोश ने बताया कि मेरे अलावा ताहिल मल्हाल, संदिल कुमार और समीना अख्तर गैस पीड़ितों और उनकी आने वाली नस्लों की आनुवांशिकी पर कार्य कर रहे हैं। इस रिसर्च में जो तथ्य सामने आए हैं उसकी सबसे भयानक बात यह है कि आज भी एमआईसी गैस का जहरीला असर लोगों की खून में दौड़ रहा है, जिसके कारण समाज को पीढ़ी दर पीढ़ी आनुवांशिक रूप से असामान्य बच्चे मिलते रहेंगे।
बदल गए गुणसूत्र
भोपाल में कुछ बस्ती और अस्पताल में आए गैस पीड़ितों पर किए गए रिसर्च में लगभग 90 फीसदी परिवारों की महिलाओं को गर्भपात हुआ है। इसका कारण मानव के शरीर के 46 से 45 गुणसूत्र हो जाना है। जिसे एक्रोसेंट्रीक एसोसिएशन कहा जाता है। इसमें से गुणसूत्रों के दो जोड़े मिलकर एक समूह बना लेते हैं। आरिफ नगर के 710 घरों से लिए नमूनों में 700 घरों में महिलाओं को कम से कम दो और अधिकतम पांच गर्भपात का इतिहास मिला है।
मुश्किल है अभी डगर
डॉ. एन गणोश ने ‘भास्कर’ को बताया कि अस्पताल की रिसर्च विंग में कोई फंडिंग नहीं होने के बाद भी शहर के हित में यह रिसर्च की जा रही है, जिसका एक टेस्ट 4500 रुपए का होता है। लोगों की आर्थिक क्षमता नहीं होने के कारण वे इस टेस्ट से बचते हैं। रिसर्च कार्यो को फंड मिले तो असरदार और सस्ती दवाएं बनाई जा सकती हैं।