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इस जख्म को कुरेदते रहिए

परदे के पीछे. border मुख्यमंत्री के पुत्र होने के कारण रितेश देशमुख अपने मित्र रामगोपाल वर्मा को ताज ले गए। विलासराव देशमुख के त्यागपत्र प्रकरण में शायद यह आखिरी कील साबित हुई, परंतु असल मुद्दा यह है कि हमने ऐसे समाज और सरकार की रचना की है जहां मंत्रियों के सुपुत्रों को संविधान के परे अधिकार दिए गए हैं।

लगातार योग्यता को नजरअंदाज करके हमने चाटुकारिता का वातावरण रचा है। कोई अफसर अपनी योग्यता का इस्तेमाल नहीं करना चाहता क्योंकि चमचागिरी के रास्ते व्यक्तिगत प्रगति होती है। शायद यही वजह है कि ताज के द्वार पर मौजूद किसी अफसर ने रितेश को नहीं रोका और उनके हाथी के साथ रामगोपाल वर्मा की दुम भी सरकारी सूई से निकल गई। ये सामंतवादी प्रवृत्तियां गणतंत्र व्यवस्था के चोर दरवाजे से घुस आई हैं। अफसरों का यह हाल है कि उन्हें झुकने का कहा जाता है और वे लेट जाते हैं।

रामगोपाल वर्मा किसी फिल्म के प्लॉट के लिए वहां नहीं गए थे। उनका एकमात्र प्रयोजन सुर्खियां हासिल करना था। अनेक दिनों तक लाइमलाइट से दूर रहने पर उन्हें अपच हो जाता है। इसी अपच के शिकार हैं अनेक नेता परंतु इस समय जनता का मूड नेताओं के प्रति हिकारत का है और इस लहर के लंबे समय तक कायम रहने से नए युग का सूत्रपात हो सकता है। केरल के मुख्यमंत्री को उनकी औकात दिखाई जा चुकी है। नरेंद्र मोदी की भेंट लेने से इंकार किया जा चुका है क्योंकि साध्वी प्रकरण में उन्हें कुछ दिन पूर्व तक खलनायक नजर आने वाला आज शहीद लग रहा है। कुछ दिन पूर्व अमरसिंह भी ऐसे ही अनुभव से गुजरे हैं।

आतंकवाद युद्ध का नया स्वरूप है और इस संकटकाल में हमारे अनगिनत आला अफसर और कमांडो नेताओं की सुरक्षा में लगाए गए हैं। वह नेता ही क्या जिसे उसकी जनता से ही बचाने के लिए उसी जनता के धन पर प्रशिक्षित कमांडो की आवश्यकता है। क्या कोई सक्षम संस्था हिसाब लगाकर बताएगी कि कितने सैनिक नेताओं की सुरक्षा में लगे हैं? क्या इस राष्ट्रीय क्षति का आकलन किया जा सकता है। हिंदुस्तान में जितने ‘विशिष्ट’ व्यक्ति हैं उतने दुनिया के अन्य देशों में विशिष्ट लोगों का कुल जोड़ भी नहीं बनता। सितारों की सुरक्षा को किसी श्रेणी में रखा जा सकता है? सरकारों के तमाम तामझाम और लाव लश्कर को घटाने का वक्त आ गया है।

आतंकवादी संगठनों ने हमारे देश का गहरा अध्ययन किया है। ये संगठन बड़ी सावधानी से काबिल लोगों को चुनकर प्रशिक्षित करते हैं। उनके द्वारा दिए गए वेतन किसी भी कॉपरेरेट से ज्यादा हैं। आला दर्जे के टेक्नोक्रेट उनके लिए काम कर रहे हैं। आधुनिकतम हथियार और जानकारियां उन्हें उपलब्ध हैं। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भ्रष्टाचार के साथ भारी आर्थिक खाई का निर्माण हुआ है और सामंतवादी प्रवृत्तियां हमेशा मुखर रही हैं।

इन तीनों देशों ने ऐसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था रची है कि इनका युवा वर्ग आतंकवादी संगठनों के प्रति आकर्षित होता है। अब आतंकवाद एक व्यवसाय है और निहायत ही काबिलियत से चलाया जा रहा है। ड्रग्स और हथियारों की तस्करी के साथ टेक्नोलॉजी की चोरी ने उन्हें विपुल धन दिया है।

भारत के पास इनसे मुकाबला करने के लिए साहस भी है और साधन भी है। सेना अध्यक्षों की सलाह से एक कमांडो फोर्स गाठी जाए जिसमें मौजूदा कमांडो को शामिल करें और आतंक से लड़ने के लिए विशेष विभाग हो, जो किसी मंत्री या नेता के अधीन काम न करे।

सारे राजनीतिक दल शपथ पत्र प्रस्तुत करें कि चुनाव में कोई भी जीते इस विशेष दस्ते के काम में दखल नहीं देगा। कमांडो दल केवल जल, थल और वायुसेना अध्यक्षों के अधीन रहेंगे। इस तरह राजनीति से पूरी तरह मुक्त संगठन ही वर्तमान आतंकवादी संगठनों से लड़ सकता है। इसे उच्चतम वेतन पाने वाला व्यवसायी संगठन बनाना होगा जिसे टेंडर निकालकर घटिया हथियार खरीदने पर बाध्य नहीं होना पड़े। अवाम इस बार लगे जख्म को भरने मत देना, इसे अपने दर्द से हमेशा कुरेदते रहना क्योंकि यह जख्म भर गया तो हम मर जाएंगे।





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